निराला, प्रेमचंद की परंपरा के आदर्श और प्रतिबद्ध लेखक थे हरिशंकर परसाई : दुबे
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व्यंग्यधारा समूह की ओर से ऑनलाइन व्यंग्य -विमर्श गोष्ठी का आयोजन
नागपुर। निराला, प्रेमचंद की परंपरा के आदर्श और प्रतिबद्ध लेखक थे हरिशंकर परसाई। उन्होंने कभी भी अपने विचारों और आत्मा से समझौता नहीं किया। यह बात वरिष्ठ व्यंग्यकार अश्विनी कुमार दुबे (इंदौर ) ने कही व्यंग्यधारा समूह की ओर से व्यंग्य के पुरोधा हरिशंकर परसाई जी के 101 वें जन्मदिन पर 'हरिशंकर परसाई सप्ताह' के अंतर्गत आयोजित 180 वीं ऑनलाइन व्यंग्य -विमर्श गोष्ठी में कही। 'व्यक्ति और व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई : कुछ अनछुए पहलू' विषय पर व्यंग्य विमर्श गोष्ठी के साथ सप्ताह का समापन हुआ। व्यंग्य विमर्श गोष्ठी में बतौर विशिष्ट वक्ता श्री दुबे बोल रहे थे। अन्य विशिष्ट वक्ता के रूप में वरिष्ठ व्यंग्यकार रमेश सैनी (जबलपुर) और 'वसुधा' पत्रिका में परसाई जी के सहयोगी रहे वरिष्ठ व्यंग्यकार सेवाराम त्रिपाठी (रीवा ) ने कई अनछुए और मार्मिक प्रसंग सुनाए जिससे माहौल भावुक गया।
अश्विनी कुमार दुबे ने परसाई जी को जिम्मेदार संपादक बताते हुए कहा कि उन्होंने वसुधा के संपादन के दौरान कभी स्तर से समझौता नहीं किया। समाज के आखिरी व्यक्ति के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी।
परसाई जी चीजों को छोड़कर आगे बढ़े : सैनी
गोष्ठी की शुरुआत करते हुए वरिष्ठ व्यंग्यकार रमेश सैनी ने परसाई जी के जीवन से जुड़े कई मार्मिक प्रसंग सुनाए। विशेषकर गर्दिश के दिनों की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह उन्होंने अपनी बहन और उनके बच्चों की परवरिश की। यहां तक कि अपने विवाह को भी टाल दिया। लेखन से होने वाली आय से ही परिवार का खर्च चलता रहा। परसाई जी अपना मूल्यांकन स्वयं करते रहे। उन्होंने कई नौकरी छोड़ी, बहुत सारे लाभ छोड़े, लेकिन उससे बढ़कर यश मिला। परसाई जी चीजों को छोड़कर आगे बढ़े।
परसाई जी का अंतर्पाठ और पुनर्पाठ करना चाहिए : त्रिपाठी
वरिष्ठ व्यंग्यकार सेवाराम त्रिपाठी ने कहा कि हरिशंकर परसाई जी को पढ़ने से ज्यादा अनुभव करना जरूरी है। परसाई जी का अंतर्पाठ और पुनर्पाठ करना चाहिए। वे प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष रहे। मैं उनका वारिस हूं। उनके साथ 'वसुधा' पत्रिका में काम किया। उनसे सैकड़ों बार मिला। परसाई जी जन शिक्षक की भूमिका में रहे। अनेक लोगों को परामर्श दिया। उन्होंने कभी अहंकार नहीं किया। मित्रों और लेखक की मदद के लिए हर समय तैयार रहे। रिक्शा वाले, बस वाले, अखबार वाले, किराना वालों से उनके संबंध रहे। 'सुनो भाई साधु', 'तुलसीदास चंदन घिसे', 'कबीरा खड़ा बाजार में' आदि कॉलम में भी लेखनी को साधारण नहीं बनाया।
जीवन से निकला सत्य लेखन में : तिवारी
प्रखर व्यंग्य आलोचक डॉ. रमेश तिवारी (नई दिल्ली) ने कहा कि परसाई जी को पढ़ते हुए उसे गुनना और समझना भी जरूरी है। परसाई जी बहुत भावुक, संवेदनशील और बेचैन व्यंग्यकार थे। उन्होंने हिमालय की तरह विराट लेखन किया। जीवन से निकला सत्य परसाई जी के लेखन में दिखाई देता है।
प्रास्ताविक और संचालन अभिजीत दुबे (दुर्गापुर) ने किया। आभार टीकाराम साहू 'आजाद' ( नागपुर) ने व्यक्त किया। गोष्ठी में रेणु देवपुरा, वीना सिंह, सिलवीया डिसिल्वा, अरुण अर्णव खरे, राजशेखर चौबे, कुमार सुरेश, परवेश जैन, डॉ किशोर अग्रवाल, डॉ सुरेश कुमार मिश्र 'उरतृप्त', भंवरलाल जाट आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।
हरिशंकर परसाई सप्ताह के अंतर्गत व्यंग्यधारा समूह में परसाई जी के व्यंग्य 'गुड़ की चाय', 'उखड़े खम्भे', 'पीढ़ियां और गिट्टियां', 'भारत को चाहिए : जादूगर और साधु', 'गर्दिश के दिन ' आदि व्यंग्यों और 'मेरी नजर में व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई' विषय पर गहन विमर्श हुआ।