राष्ट्रीय खेल दिवस पर ध्यानचंद का अटल रुख !
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राष्ट्रीय खेल दिवस विभिन्न देशों में राष्ट्रीय खेल टीमों और उन देशों की खेल परंपराओं का सम्मान करने के लिए मनाया जानेवाला एक सार्वजनिक अवकाश है। इस दिन विभिन्न आयु वर्ग के लोग कबड्डी, मैराथन, बास्केटबॉल, हॉकी आदि जैसे खेलों में हिस्सा लेते हैं। उनकी आत्मकथा ‘गोल्स’ के अनुसार उन्होंने 1926 से 1949 तक अपने करियर में 900 गोल किए। उन्होंने अपने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय करियर में 185 मैचों में 570 गोल किये। अंतर्राष्ट्रीय मैचों में उन्होंने 400 से अधिक गोल किए। उन्होंने अपने खेल जीवन में 1000 से अधिक गोल दागे। जब वो मैदान में खेलने को उतरते थे तो गेंद मानों उनकी हॉकी स्टिक से चिपक सी जाती थी। उन्हौने अप्रैल 1949 को प्रथम श्रेणी की हाकी से संन्यास ले लिया। उसी वर्ष वह मेजर के पद के साथ सेना से सेवानिवृत्त हुए।
मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार आधिकारिक तौर पर खेल और खेल में ‘ध्यानचंद लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’, खेल की दुनिया में आजीवन उपलब्धि के लिए भारत सरकार द्वारा दिया जानेवाला एक सर्वोच्च पुरस्कार है। इस पुरस्कार का नाम भारतीय हॉकी खिलाड़ी ध्यानचंद के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने 1926 से 1948 तक 20 वर्षों के करियर में 1000 से अधिक गोल किए। यह पुरस्कार प्रतिवर्ष खेल एवं युवा मामलों के मंत्रालय द्वारा प्रदान किया जाता है। पहला पुरस्कार वर्ष 2002 में दिया गया था। इस प्रथम पुरस्कार के प्राप्तकर्ता शाहूराज बिराजदार (मुक्केबाजी), अशोक दीवान (हॉकी) और अपर्णा घोष (बास्केटबॉल) थे। यह पुरस्कार हर साल 3 से 5 खिलाड़ियों को दिया जाता है। अंतरराष्ट्रीय हॉकी क्षेत्र और मैदान पर अपनी छाप छोड़ने और अपने देश को कई बार गौरव के शिखर तक पहुँचाने के बाद वह भारतीय और विश्व हॉकी में एक महान हस्ती थे। उनके जन्मदिन पर राष्ट्रीय खेल दिवस समारोह होता है। इस दिन राष्ट्रपति मेजर ध्यानचंद खेल रत्न, अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार नामित लोगों को प्रदान करते हैं।
मेजर ध्यान चंद भारतीय फील्ड हॉकी के भूतपूर्व खिलाड़ी एवं कप्तान थे। भारत एवं विश्व हॉकी के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में उनकी गिनती होती है। उनका जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद में एक राजपूत परिवार में हुआ था। वह रामेश्वर सिंह और शारदा के पुत्र थे। मूल सिंह और रूप सिंह ध्यानचंद के दो भाई हैं। “राष्ट्रीय खेल दिवस” 29 अगस्त को भारत के दिग्गज हॉकी प्लेयर मेजर ध्यानचंद की जयंती पर मनाया जाता है। इस दिन ध्यान चन्द का जन्म हुआ था। मेजर ध्यान चन्द को हॉकी का जादूगर कहा जाता है। यह दिन भारत के लिए ओलंपिक में तीन बार स्वर्ण पदक जीतने वाले हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद सिंह के जन्मदिन का प्रतीक है। सर्वकालिक महान हॉकी खिलाड़ियों में से एक ध्यानचंद का जन्म आज ही के दिन हुआ था। चंद के पिता ब्रिटिश भारतीय सेना में कार्यरत थे, जहाँ वे हॉकी टीम के सदस्य थे। चंद अपने असाधारण गेंद संचालन और गोल स्कोरिंग कौशल के लिए जाने जाते थे। इन जीतों के अलावा उनका प्रभाव 1928 और 1964 के बीच आयोजित आठ ओलंपिक में देखा जा सकता है, जहां भारत ने सात बार फील्ड हॉकी प्रतियोगिता जीती।
बाल्य-जीवन में खिलाड़ीपन के कोई विशेष लक्षण दिखाई नहीं देते थे। इसलिए कहा जा सकता है कि हॉकी के खेल की प्रतिभा जन्मजात नहीं थी, बल्कि उन्होंने सतत साधना, अभ्यास, लगन, संघर्ष और संकल्प के सहारे यह प्रतिष्ठा अर्जित की थी। साधारण शिक्षा प्राप्त करने के बाद 16 वर्ष की अवस्था में 1922 में दिल्ली में प्रथम ब्राह्मण रेजीमेंट में सेना में एक साधारण सिपाही की हैसियत से भरती हो गए। जब ‘फर्स्ट ब्राह्मण रेजीमेंट’ में भरती हुए उस समय तक उनके मन में हॉकी के प्रति कोई विशेष दिलचस्पी या रूचि नहीं थी। ध्यानचंद को हॉकी खेलने के लिए प्रेरित करने का श्रेय रेजीमेंट के एक सूबेदार मेजर तिवारी को है। मेजर तिवारी स्वंय भी प्रेमी और खिलाड़ी थे। उनकी देख-रेख में ध्यानचंद हॉकी खेलने लगे देखते ही देखते वह दुनिया के एक महान खिलाड़ी बन गए। तत्पश्चात 1927 में लांस नायक बना दिए गए। 1932 में लॉस ऐंजल्स जाने पर नायक नियुक्त हुए। 1937 में जब भारतीय हाकी दल के कप्तान थे तो उन्हें सूबेदार बना दिया गया। जब द्वितीय महायुद्ध प्रारंभ हुआ तो 1943 में ‘लेफ्टिनेंट’ नियुक्त हुए और भारत के स्वतंत्र होने पर 1948 में कप्तान बना दिए गए। केवल हॉकी के खेल के कारण ही सेना में उनकी पदोन्नती होती गई। 1938 में उन्हें ‘वायसराय का कमीशन’ मिला और वे सूबेदार बन गए। उसके बाद एक के बाद एक दूसरे सूबेदार, लेफ्टीनेंट और कैप्टन बनते चले गए। बाद में उन्हें मेजर बना दिया गया।
ध्यानचंद को फुटबॉल में पेले और क्रिकेट में ब्रैडमैन के समतुल्य माना जाता है। गेंद इस कदर उनकी स्टिक से चिपकी रहती कि प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को अक्सर आशंका होती कि वह जादुई स्टिक से खेल रहे हैं। यहाँ तक हॉलैंड में उनकी हॉकी स्टिक में चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़ कर देखी गई। जापान में ध्यानचंद की हॉकी स्टिक से जिस तरह गेंद चिपकी रहती थी उसे देख कर उनकी हॉकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात कही गई। ध्यानचंद की हॉकी की कलाकारी के जितने किस्से हैं उतने शायद ही दुनिया के किसी अन्य खिलाड़ी के बाबत सुने गए हों। उनकी हॉकी की कलाकारी देखकर हॉकी के मुरीद तो वाह-वाह कह ही उठते थे बल्कि प्रतिद्वंद्वी टीम के खिलाड़ी भी अपनी सुधबुध खोकर उनकी कलाकारी को देखने में मशगूल हो जाते थे। उनकी कलाकारी से मोहित होकर ही जर्मनी के रुडोल्फ हिटलर सरीखे जिद्दी सम्राट ने उन्हें जर्मनी के लिए खेलने की पेशकश कर दी थी। लेकिन ध्यानचंद ने हमेशा भारत के लिए खेलना ही सबसे बड़ा गौरव समझा। वियना में ध्यानचंद की चार हाथ में चार हॉकी स्टिक लिए एक मूर्ति लगाई और दिखाया कि ध्यानचंद कितने जबर्दस्त खिलाड़ी थे।
राष्ट्रीय खेल दिवस स्कूलों, कॉलेजों और खेल संघों में विभिन्न प्रतियोगिताओं, खेल आयोजनों और गतिविधियों के साथ मनाया जाता है। आयोजनों में अक्सर मैराथन, स्कूल फिटनेस प्रतियोगिताएं, एथलीट श्रद्धांजली कार्यक्रम और फिटनेस चुनौतियां शामिल होती हैं। मेजर ध्यानचंद की जयंती यानी राष्ट्रीय खेल दिवस 2025 की कोई विशेष थीम घोषित नहीं हुई है, लेकिन 2025 में खेल और फिटनेस को बढ़ावा देने के लिए एक तीन दिवसीय राष्ट्रव्यापी ‘खेल एवं फिटनेस आंदोलन’ ‘एक घंटा, खेल के मैदान में’ के तहत आयोजित किया जाएगा, जिसका लक्ष्य जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से बचाव के लिए प्रतिदिन कम से कम 60 मिनट शारीरिक गतिविधि को बढ़ावा देना है। यह थीम इस बात पर प्रकाश डालती है कि एथलेटिक्स कैसे सामाजिक बंधनों को मजबूत कर सकता है, व्यक्तियों को एक साथ ला सकता है और समुदायों को समावेशिता और शांति को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक उपकरण प्रदान कर सकता है।
मेजर ध्यानचंद ने हॉकी का खेल अपने कोच पंकज गुप्ता से सीखा था। हॉकी में उनके स्तर तक आज तक कोई पहुँच नहीं पाया। उन्होंने हॉकी खेल में भारत का नाम ऊँचा किया था, इस लिए इनके जन्म दिन को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। भारतीय ओलम्पिक संघ ने ध्यानचंद को शताब्दी का खिलाड़ी घोषित किया था। भारत सरकार ने उन्हें 1956 में भारत के तीसरे सबसे बड़े नागरिक पुरस्कार पद्मभूषण से सम्मानित किया। फिलहाल ध्यानचंद को भारत रत्न देने की मांग भी की जा रही है। भारत रत्न को लेकर ध्यानचंद के नाम पर अब भी विवाद जारी है। आज उनकी 120 वी जयंती के अवसर पर सभी को ‘राष्ट्रीय खेल दिवस’ की हार्दिक शुभकामनाएँ !
- प्रविण बागडे
नागपुर, महाराष्ट्र