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मोबाइल की चकाचौंध में खोता बचपन...


बढ़ते अपराध की आहट

नागपुर में हाल ही में घटी एक दर्दनाक घटना ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया। एक नाबालिग लड़के ने प्रेम प्रसंग में असफल होने पर 16 वर्षीय छात्रा की बेरहमी से हत्या कर दी। यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि समाज को चेतावनी है कि हमारे बच्चों की मानसिकता किस दिशा में बढ़ रही है।

आज मोबाइल फोन बच्चों के जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है। पढ़ाई, मनोरंजन और सामाजिक संपर्क के लिए यह ज़रूरी साधन है, परंतु इसके गलत और अनियंत्रित प्रयोग ने बच्चों के मन पर गहरा असर डाला है। मोबाइल पर उपलब्ध हिंसक खेल, अश्लील सामग्री और सोशल मीडिया की उत्तेजक रील्स बच्चों की सोच को विकृत कर रही हैं। थोड़ी-सी असफलता या नकार मिलने पर वे आक्रोश, हिंसा और आत्मघाती कदमों की ओर बढ़ जाते हैं।

चिंताजनक स्थिति तब होती है जब माता-पिता बच्चों को मोबाइल सीमित समय के लिए देते हैं या कभी मोबाइल देने से इनकार करते हैं। ऐसे में कई बच्चे आत्महत्या की कोशिश करते हैं, घर से भाग जाते हैं या परिवार में झगड़े करते हैं। यानी मोबाइल बच्चों के जीवन का इतना बड़ा हिस्सा बन चुका है कि उसके बिना वे असहाय महसूस करने लगे हैं। यह किसी नशे की लत जैसी स्थिति है।

लेकिन समस्या केवल मोबाइल तक सीमित नहीं है। बड़ी चुनौती मोबाइल पर उपलब्ध सामग्री है। गूगल, फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे मंचों पर अश्लील साहित्य, भड़काऊ वीडियो और उत्तेजक रील्स आसानी से उपलब्ध हैं। यही कंटेंट बच्चों को समय से पहले "बड़ा" बना देता है और उनके रिश्तों व समाज को देखने की दृष्टि को विकृत करता है।

सरकार और कानून की इसमें बड़ी भूमिका है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 तथा आईटी नियम 2021 के अंतर्गत सोशल मीडिया कंपनियों को अश्लील और हानिकारक सामग्री हटाने की जिम्मेदारी दी गई है। शिकायत मिलने पर 24 घंटे के भीतर आपत्तिजनक सामग्री हटाना अनिवार्य है। भारतीय दंड संहिता की धाराएँ 292 और 293 अश्लील सामग्री के प्रकाशन व वितरण पर दंड का प्रावधान करती हैं। इसके अलावा, बच्चों की सुरक्षा के लिए POCSO अधिनियम 2012 भी लागू है, जिसके तहत नाबालिगों को अश्लील सामग्री दिखाना गंभीर अपराध है।

सरकार चाहे तो इन कानूनों को और कड़ा बनाकर अश्लील व उत्तेजक रील बनाने वालों, उन्हें फैलाने वालों और उन्हें बढ़ावा देने वाले प्लेटफॉर्म्स पर सख्त कार्रवाई कर सकती है। साथ ही, कंटेंट फिल्टरिंग और आयु-सीमा (age verification) जैसे उपाय अनिवार्य किए जा सकते हैं।

परंतु केवल कानून से समस्या का समाधान संभव नहीं है। माता-पिता और शिक्षकों को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। घर में संवाद का माहौल बनाना, बच्चों को सही-गलत की समझ देना और मोबाइल का संयमित उपयोग सिखाना अत्यंत आवश्यक है। स्कूलों में डिजिटल साक्षरता और भावनात्मक शिक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहिए ताकि बच्चे असफलता को स्वीकारना, गुस्से को संभालना और रिश्तों की मर्यादा सीख सकें।

नागपुर की यह घटना हमें याद दिलाती है कि समय रहते कदम उठाना जरूरी है। मोबाइल स्वयं में दुश्मन नहीं है, लेकिन उसका गलत और अनियंत्रित प्रयोग अवश्य ही समाज का दुश्मन बनता जा रहा है। बच्चों के हाथ में मोबाइल देने से पहले उनके मन में सही संस्कार देना ही आज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

डॉ. प्रवीण डबली 
वरिष्ठ पत्रकार 
9422125656/7020343428
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