जैन आहार की प्रासंगिकता
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आधुनिक युग तकनीकी प्रगति के साथ- साथ अत्यधिक उपभोग का युग बन गया है, जहाँ भोजन स्वास्थ्य और संस्कार का माध्यम न रहकर स्वाद, सुविधा और दिखावे की वस्तु बन गया है। इस संदर्भ में जैन आहार केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक गहरी जीवन-दृष्टि के रूप में उभरता है, जो भोजन के माध्यम से मनुष्य की चेतना, आचरण और उत्तरदायित्व को संबोधित करता है।
जैन आहार अहिंसा को केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि दैनिक अभ्यास के रूप में स्थापित करता है और उपभोक्तावादी संस्कृति के विरुद्ध संयम व विवेक का संदेश देता है। यह न केवल शरीर और मन के स्वास्थ्य को संतुलित करता है, बल्कि पर्यावरणीय संकट के समाधान की दिशा में भी सार्थक दृष्टि प्रदान करता है। भोजन को भोग के स्थान पर साधना मानने की यह परंपरा मनुष्य को उपभोक्ता से संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनने की ओर प्रेरित करती है।
इस प्रकार, जैन आहार की प्रासंगिकता आज के समय में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अहिंसा, संयम और विवेक जैसे सार्वभौमिक मूल्यों के माध्यम से व्यक्ति, समाज और भविष्य – तीनों के संतुलित निर्माण की राह दिखाता है।
आज का समय केवल तकनीकी प्रगति का नहीं, बल्कि अत्यधिक उपभोग का समय है। हमने जीवन को तेज़ तो बना लिया है, पर गहरा नहीं। भोजन, जो कभी स्वास्थ्य, संस्कार और संतुलन का माध्यम था, आज स्वाद, सुविधा और दिखावे की वस्तु बन गया है। ऐसे दौर में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है— क्या हमारा भोजन हमें बेहतर मनुष्य बना रहा है, या केवल बेहतर उपभोक्ता? इसी प्रश्न के केंद्र में जैन आहार खड़ा दिखाई देता है। यह कोई संकीर्ण धार्मिक नियमावली नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवन- दृष्टि है जो भोजन के माध्यम से मनुष्य की चेतना को संबोधित करती है। जैन दर्शन का मूल आग्रह स्पष्ट है- यदि जीवन को शुद्ध बनाना है, तो उसकी शुरुआत थाली से करनी होगी।
अहिंसा - केवल सिद्धांत नहीं, दैनिक अभ्यासः आज अहिंसा शब्द अक्सर भाषणों, नारों और आदर्शों तक सीमित रह गया है। व्यवहार में उसका स्थान सिकुड़ता जा रहा है। जैन आहार इस दूरी को पाटता है। यह हमें याद दिलाता है कि अहिंसा केवल किसी को न मारने का नाम नहीं, बल्कि जीवन के हर रूप के प्रति गहन सम्मान की भावना है।
जब व्यक्ति यह सोचने लगता है कि उसके भोजन का चयन किसी अन्य जीव के जीवन, कष्ट या मृत्यु से जुड़ा है, तब उसके भीतर उत्तरदायित्व जन्म लेता है। यही उत्तरदायित्व अहिंसा को विचार से निकालकर व्यवहार में स्थापित करता है। इस दृष्टि से जैन आहार आज के हिंसक और असंवेदनशील वातावरण में एक मौन, किंतु प्रभावशाली प्रतिरोध है।
उपभोक्तावाद बनाम संयम: आधुनिक समाज में 'अधिक' ही “सफलता” का पर्याय बन चुका है—अधिक खाना, अधिक खरीदना, अधिक संग्रह करना । पर इसका परिणाम स्पष्ट है— शारीरिक रोग, मानसिक तनाव और सामाजिक असंतुलन। जैन आहार इस प्रवृत्ति के विरुद्ध खड़ा होकर संयम को कमजोरी नहीं, बल्कि विवेक के रूप में प्रस्तुत करता है।
यह संयम अभाव से नहीं, बल्कि समझ से उपजता है। सीमित, शुद्ध और आवश्यक भोजन का चयन आत्म- नियंत्रण का अभ्यास है, जो धीरे-धीरे जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी संतुलन लाता है। दार्शनिक दृष्टि से देखें तो यह विचार आज की भोगवादी संस्कृति के लिए एक आवश्यक चेतावनी है।
स्वास्थ्य: शरीर और मन -दोनों का प्रश्न: आज की अधिकांश बीमारियाँ जीवनशैली से जुड़ी हैं। अनियमित भोजन, अत्यधिक तला-भुना और कृत्रिम स्वादों से भरा आहार शरीर को ही नहीं, मन को भी अशांत करता है। जैन आहार का सरल, सात्त्विक और हल्का स्वरूप केवल पाचन को नहीं सुधारता, बल्कि मानसिक स्थिरता भी प्रदान करता है।
तनाव, चिड़चिड़ापन और असंतोष - ये सब केवल मानसिक समस्याएँ नहीं, बल्कि भोजन की गुणवत्ता से भी जुड़ी हुई हैं। इस संदर्भ में जैन आहार आधुनिक स्वास्थ्य विमर्श का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
पर्यावरणीय संकट और जैन दृष्टि: जलवायु परिवर्तन, संसाधनों की कमी और पर्यावरणीय असंतुलन आज वैश्विक चिंता का विषय हैं। इन समस्याओं की जड़ में भी अत्यधिक उपभोग ही है। जैन आहार सीमित संसाधनों के विवेकपूर्ण
उपयोग और अनावश्यक दोहन से बचने की शिक्षा देता है। यह दृष्टि केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और वैश्विक भी है। यदि समाज जैन आहार की मूल भावना कम लेना, सोच-समझकर लेना को अपनाए, तो पर्यावरणीय संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
भोजन से साधना तक: जैन परंपरा में भोजन को भोग नहीं, साधना माना गया है। यह विचार आज के समय में असामान्य लग सकता है, पर यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है। जब भोजन साधना बनता है, तब मनुष्य केवल पेट नहीं भरता, बल्कि अपने संस्कार भी गढ़ता है।
हर निवाले के साथ जागरूकता - मैं क्या खा रहा हूँ, क्यों खा रहा हूँ और इसका मेरे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा- यह प्रश्न मनुष्य को उपभोक्ता से जिम्मेदार नागरिक और अंततः संवेदनशील मानव बनाता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि जैन आहार को किसी एक समुदाय की पहचान तक सीमित न किया जाए। इसकी मूल भावना - अहिंसा, संयम और विवेक सार्वभौमिक है।
यह थोपी जाने वाली व्यवस्था नहीं, बल्कि अपनाई जाने वाली समझ है। जिस समाज में भोजन पर विवेक लौट आएगा, वहाँ जीवन में हिंसा, असंतुलन और अराजकता अपने आप कम होने लगेंगे। जैन आहार हमें यही स्मरण कराता है कि हर निवाला केवल शरीर का नहीं, मन, समाज और भविष्य का भी निर्माण करता है। यही इसकी सबसे बड़ी और सबसे आधुनिक प्रासंगिकता है।
- प्राचार्य डॉ. नितिन सिंघवी
सरदार पटेल महाविद्यालय, मोहदा
