'सिंहासन खाली करो जनता आती है' नागपुर वैचारिक मंच में एस एन विनोद का इतिहास प्रसिद्ध घोष व्यक्तव्य
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नागपुर। नागपुर वैचारिक मंच की विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभा कक्ष में आयोजित साहित्य और प्रकृति में सामंजस्य विषय पर बोलते हुए वरिष्ठ संपादक, पत्रकार एस. एन. विनोद ने अध्यक्षता करते हुए कहा, साहित्य आज भी समाज का दर्पण है क्योंकि आज भी वही आदेशित विषय है और जनता का कोण भी वही है, 'सिंहासन खाली करो, जनता आती है'। आगे उन्होंने कहा आने वाली पीढ़ी को लोकतंत्र के लिए पुराने पन्ने खोजना ही पड़ेंगे। आज अघोषित आपातकाल जो है।
कार्यक्रम की शुरुआत वरिष्ठ साहित्यकार नेहा भंडारकर द्वारा मराठी साहित्यकारों का विभिन्न विधाओं में साहित्य और प्रकृति का वर्णन कर संत परंपराओं और लोक कथाओं का विवरण दिया। प्रसिद्ध कथाकार इंदिरा किसलय का कहना की प्रकृति नहीं रहेगी तो साहित्य ही नहीं रहेगा। आज जल, वायु, मिट्टी का प्रगति के नाम पर दोहन जो रहा है, अतः साहित्यकार का दायित्व और भी बढ़ गया है।
मंच संचालक व प्रसिद्ध शायर डॉ. सागर खादीवाला ने साहित्य और प्रकृति को एक दूसरे का पूरक बता कहा साहित्य प्रकृति वर्णन से अछूता नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार पूर्णिमा पाटिल का मानना था कि मनुष्य जब उदास होता है तो मतलब साफ है प्रकृति उसके अनुकूल नहीं है। क्योंकि साहित्यकार प्रकृति को महसूस करता है।
वरिष्ठ कवयित्री धृति बेड़ेकर ने कहा साहित्य सृजन में प्रकृति सदा प्रेरणा रही है । कथाकार मधु पाटोदिया ने कहा आज हम प्रकृति को नष्ट करने में अग्रसर हैं, जबकि कोरोना कल में प्राणी दरख्तों के नीचे शुद्ध हवा पाकर सुरक्षित था।
वरिष्ठ संपादक पावर आफ वन के नीरज श्रीवास्तव ने कहा साहित्यकार को प्रकृति का ध्यान रखना जरूरी है और समरसता बनाए रखने हेतु प्रकृति विषय को लेकर मानवीय विचारों को जोड़ना होगा।
वरिष्ठ साहित्यकार और हिंदी विभाग अध्यक्ष डॉ. मनोज पांडे ने विस्तार से विषय को रखते हुए कहा, प्रकृति ही सब कुछ है हमें साहित्यकार के रूप में स्वयं से प्रश्न करना होगा, क्या हम साहित्यकार हैं और हमारी अपनी भूमिका हमें ही तय करनी होगी और सोचना होगा क्या हम पाठक तक पहुंच रहे हैं। तंत्र आजका है जो वैश्विक प्रणाली को बर्बाद कर रहा है, वही चिंता कर कर रहा है। अब क्या कहूं, हमें छोटे- छोटे सरोकारों की चिंता कर लिखना ही होगा।
सहसंयोजक व साहित्यप्रेमि नरेंद्र परिहार ने इतिहास की परतों और उसके बदलाव में वैज्ञानिक दृष्टि से साहित्य और प्रकृति को खोज शन: शान: उसे समझ कर चेतना का संचार करने को अनिवार्य बताया।
नाटककार तेजवीर सिंह का मानना था कि साहित्यकार का दृष्टिकोण व्यापक हो।
पत्रकार व्यंगकार टीकाराम साहू आजाद ने कहा प्रकृति साहित्य की प्रेरणा रही है, आज जरूरत है प्रकृति की दोहन प्रवृत्ति और प्रणाली में जरूरत है चेतना जागृत करने की।
मंच संचालक व्यंग्य कवि राजेंद्र पटोरिया ने नया रूपक गढ़ा 'जल में भी जीव है' और कार्यक्रम का सुंदर संचालन कर बीच-बीच में साहित्य और प्रकृति के आवरण को खोलते हुए अपनी व्यंग्य शैली में कई सूक्ष्म प्रश्नों को खड़ा कर उसके समाधान ढूंढने का हमें प्रयत्न करने होंगे।
इस कार्यक्रम में कृष्ण नागपाल ने इतिहास में अभिव्यक्त साहित्यकारों के हवाले से प्रकृति का वर्णन कर कहा प्रकृति हमें सदा प्रेरणा देती है।
इस कार्यक्रम में प्रकृति और साहित्य के सामंजस्य पर विवरण देते हुए *प्रभा मेहता, मधुलता व्यास, सुदर्शन चक्रधर, नीरज व्यास, दुर्गा प्रसाद अग्रवाल, कवि डॉ. शशिकांत शर्मा, गुरु कौशल, उषा अग्रवाल और वरिष्ठ साहित्यकार प्रभा ललित सिंह ने अपने मत व्यक्त किये।
कार्यक्रम का आभार टीकाराम साहू आजाद और प्रस्तावित नरेंद्र परिहार ने किया । इस अवसर पर अगले कार्यक्रम 22 फरवरी को साहित्य में नैतिकता विषय पर आयोजन की रूपरेखा रखी।
