प्रचलित नियमों के पालन से देश समृद्ध व प्रगत होता है : हेमंत तिवारी
नागपुर। विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मेलन, हिंदी मोर भवन, सीताबर्डी, नागपुर में उपक्रम चौपाल के अंतर्गत "क्या, मनुष्य ने नियम बनाया मनुष्य के लिए?" इस शीर्षक के अंतर्गत संयोजक विजय तिवारी सहसंयोजक हेमंत कुमार पांडे के मार्गदर्शन में परिचर्चा का आयोजन किया गया।
परिचर्चा के मुख्य अतिथि के रूप में हेमंत देवनाथ तिवारी, ब्रांच सुपरवाइजर, इंटर एक्टिव प्रिंटिंग सॉल्यूशन, किंगडम ऑफ़ बहरीन, गल्फ उपस्थित थे।
चौपाल की परंपरा के अनुसार कार्यक्रम की शुरुआत विद्या की देवी, वीणा वादिनी, मां सरस्वती की वंदना के साथ की गई।
शुरुआत में मदन गोपाल बाजपेई, धीरज दुबे, व पदमदेव दुबे ने मुख्य अतिथि का अंग वस्त्र व सम्मान चिन्ह के साथ स्वागत किया।
चर्चा के आरंभ में मदनगोपाल वाजपेई ने परिवार, समाज, स्कूल, प्रशासन में दैनिक अनुभव के साथ नियमों का पालन, उनका उल्लंघन और उनके परिणामों की अनेक उदाहरण के साथ विस्तृत चर्चा की।
धीरज दुबे ने कोरोना के समय नियमों का पालन किस प्रकार से किया गया इसके अनेक उदाहरण दिए व दैनिक जीवन में भी ऐसे ही नियमों का पालन करना चाहिए इस बात के लिए प्रोत्साहित किया।
डॉ. बच्चू पांडे ने लॉकडाउन के समय नियमों का पालन करते हुए कोरोना काल में किस प्रकार सुबह से शाम तक समाज की सेवा में समय व्यतीत किया व उनकी अध्यापन सेवा के अंतिम समय में उन्हें किसी के द्वारा प्रताड़ित होने पर नियम और कानून ने उनकी कैसे मदद की व उन्हें प्रताड़ना से मुक्ति मिली इस पर उन्होंने अपने अनुभव साझा किया।
पदमदेव दुबे ने वर्तमान समाज रचना में प्रशासन की लापरवाही व अपने कार्य के प्रति उदासीनता के परिणाम स्वरूप मध्यस्थ वर्ग की उपस्थिति व अनिवार्यता बताते हुए उन्होंने अपने जीवन के अनेक उदाहरण पेश किए। लक्ष्मी नारायण केसर ने बहुत ही कम पंक्तियों में नियमों की अनिवार्यता, पालन, और उसकी महत्ता के बारे में चर्चा की।
श्रीमती माया शर्मा दीदी ने अपने शैक्षिक जीवन, परिवारक जीवन व दैनिक जीवन के आवश्यक नियम उनके लाभ व वर्तमान में उनकी उपयोगिता के बारे में अनेक उदाहरण दिए।
सहसंयोजक श्री हेमंत कुमार पांडे ने इतिहास के आधार पर समाज में फैली असमानता, वैमनस्यता की स्थिति की बात कर, प्रशासकों द्वारा नियम व नियमों का पालन न होने पर शिक्षा/ दंड के प्रावधान के साथ कानून बनाने की ऐतिहासिक चर्चा की। इसमें उन्होंने ब्रिटिश शासन काल के अनेक कानून उनकी अनिवार्यता, उल्लंघन व निवारण के अनेक उदाहरण पेश किए, जैसे की, शहरी भूमि अधिनियम, भूदान यज्ञ, की अनिवार्यता व उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह लगाया।
इसी प्रकार शस्त्र धारण अधिनियम लागू होने के बावजूद भारत की भूमि पर अनेक नरसंहार के उदाहरण पेश किए जिसमें भारत के बहुसंख्यक समुदाय पर हर काल में प्रशंसकों द्वारा अत्याचार, अन्याय की चर्चा की।
इसी प्रकार वर्तमान में प्रचलित मंदिर अधिग्रहण अधिनियम, एट्रोसिटी एक्ट, यूजीसी एक्ट, आरक्षण नियम का दुरुपयोग, पास्को एक्ट, ह्यूमन ट्रैफिकिंग एक्ट, एंटी ड्रग एक्ट, कम्युनल राइट एक्ट, वर्तमान में चर्चा में रहने वाले जनसंख्या नियंत्रण कानून, सी ए ए, एन आर सी, एस आई आर, ऐसे अनेक कानून की अनिवार्यता व उनकी उपयोगिता पर विस्तृत चर्चा की।
उन्होंने एक मानवतावादी कविता की पंक्ति प्रस्तुत की, "यही पशु प्रवृत्ति है की, जो आप आप ही चरे, वही मनुष्य है की, जो मनुष्य के लिए जिए, 'वही मनुष्य है की जो मनुष्य के लिए मरे'
उन्होंने 'समर्थ को नहीं दोष गोसाई' इस उद्गार की दुरउपयोगिता बताते हुए अपने वाणी को विराम दिया।
मुख्य अतिथि श्री हेमंत देवनाथ तिवारी ने वर्तमान में बालपन से ही दैनिक जीवन में परिवार में ही संस्कारों की नींव डालते हुए जीवन संवारने की अनेक उदाहरण दिए। कार्यक्रम का सफल संचालन संयोजक विजय तिवारी ने बहुत ही सुंदर ढंग से किया।
कार्यक्रम के अंत में मदनगोपाल बाजपेई ने मुख्य अतिथि, संयोजक, सहसंयोजक इसी प्रकार श्रोताओं और वक्ताओं का आभार प्रदर्शन किया।
कार्यक्रम को सफल बनाने में सर्व श्री संजय शर्मा, मोहन प्रसाद तिवारी, शत्रुघ्न तिवारी, रमेश मौदेकर, डॉ सौरभ शुक्ला, वैभव शर्मा, सचिन शुक्ला, मुकुंद द्विवेदी, डॉ कृष्ण कुमार द्विवेदी,भागवत पांडे, इत्यादि ने अपना अमूल्य योगदान दिया