होली मिलन में कवियों ने बिखेरे कविताओं के रंग
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नागपुर। अर्चना साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था के तत्वावधान में श्री चंचल हंसपाल के निवास स्थान पर होली मिलन समारोह एवं सरस काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। सुप्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. गोविंद प्रसाद उपाध्याय ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की जबकि प्रमुख अतिथि के रूप में सुप्रसिद्ध समाजसेवी जयराम दुबे, विशिष्ट अतिथि के रूप में अनिल त्रिपाठी उपनिदेशक, प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त कार्यालय (मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़) एवं संस्थाध्यक्ष डॉ. शशिकांत शर्मा मंचासीन थे। माँ शारदा एवं स्व.डॉ. हरभजन सिंह हंसपाल के चित्र को माल्यार्पण एवं डॉ. शशिकांत शर्मा की सरस्वती वंदना से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। चंचल हंसपाल ने मंचासीन अतिथियों का पुष्प गुच्छ एवं उपस्थित कवियों का पुष्प देकर व गुलाल का टीका लगाकर स्वागत किया।
संस्था के कार्याध्यक्ष अतुल त्रिवेदी ने अपने प्रास्ताविक में संस्था के उद्देश्यों, गतिविधियों एवं भावी योजनाओं पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर अनिल त्रिपाठी ने भारतीय त्यौहारों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि होली सामाजिक एकता एवं समरसता का विशेष पर्व है। जयराम दुबे ने अपने वक्तव्य में होली की शुभकामनाएँ देते हुए उपस्थित जनों से भारतीय संस्कृति की विरासत आगामी पीढ़ी तक हस्तांतरित करने का आग्रह किया। अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. गोविंद प्रसाद उपाध्याय ने कहा कि समय के साथ चलते रहना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि ये पर्व व्यक्ति को निरंतर सक्रिय बनाए रखते हैं जिससे समाज निरंतर प्रगति की राह पर चलता रहता है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. शशिकांत शर्मा ने किया।
तत्पश्चात डॉ. कृष्ण कुमार द्विवेदी के संचालन में सरस काव्यगोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमें उपस्थित कवि- कवित्रियों ने विविध रंगोंवाली कविताएँ गीत-ग़ज़ल एवं व्यंग्य कविताएँ प्रस्तुत कीं। काव्यपाठ करने वालों में सर्वश्री बालकृष्ण महाजन, अरुण घारपुरे, मोहन लाल, कंचन प्रजापति, सत्येंद्र प्रसाद सिंह, टीकाराम साहू 'आजाद', नरेंद्र परिहार 'एकांत', डॉ. मधुकर वाघमारे, ओमप्रकाश शिव, चंचल हंसपाल, दीनानाथ शुक्ल, दयाशंकर तिवारी 'मौन', प्रकाश काशिव, कृष्ण कुमार द्विवेदी, अतुल त्रिवेदी, डॉ. शशिकांत शर्मा, जयराम दुबे, डॉ. गोविंद प्रसाद उपाध्याय, श्रीमती सुधा काशिव, डॉ. अमरजीत कौर हंसपाल, डॉ. हरविंदर कौर हंसपाल ने विविध रचनाएँ प्रस्तुत कीं। कार्यक्रम के अंत में दीनानाथ शुक्ल ने आभार व्यक्त किया।
