आज के बुजुर्गों की त्रासदी
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होते हैं कुछ कृतघ्न,
ऐसे बच्चों को भला क्या कहिये,
जो सेवा करते नहीं माँ बाप की,
उन पर ध्यान ही क्यों कर दिजिये?
ख़ामियों की चर्चा ही
उनकी करते हैं सब ओर,
अच्छाइयों की बात का
उनके नहीं मन में ठौर।।
कर्तव्य था माँ बाप का,
बच्चों को पढ़ाना, बढ़ाना,
दायित्व बच्चे भूल गये,
अपने कर्तव्यों को निभाना।।
सामंजस्य अब दोनों बनायें कैसे,
बदल गया है जमाना,
संयुक्त परिवार का अब
काम ही है आपस में टकराना।।
पहले से ज्यादा आजकल,
बच्चे यथार्थवादी हो चले हैं,
माता पिता की सुख सुविधा,
का ध्यान भूलते चले हैं।।
अपेक्षाएँ बड़ों की,
अब दरकिनार होने लगी,
उनकी रोजमर्रा की ज़रूरतें भी
बोझ हैं लगने लगी।।
काश! ये बात माता पिता
यदि पहले से ही जानते।
तो ऐसे बच्चे तो वो
कदापि पैदा ही नहीं करते।।
दर्द का मंजर कभी
नजर नहीं आयेगा,
एक बार दर्द से रिश्ता
बनाकर तो देख लो।
दर्द से प्यार तब
खुद हो जायेगा
उसे अपनाकर तो देख लो।।
- रामनारायण मिश्र
नागपुर, महाराष्ट्र