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मराठी पहचान का सम्मान : प्रताप सरनाईक का एक दूर की सोच वाला फैसला


नागपुर (दिवाकर मोहोड़)। महाराष्ट्र संतों की परंपरा, शानदार संस्कृति और समृद्ध भाषाई विरासत की धरती। इस धरती की असली पहचान इसकी मातृभाषा, यानी मराठी में है। इस मराठी भाषा की शान और सम्मान को बनाए रखने के लिए ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर प्रताप सरनाईक का लिया गया फैसला निश्चित रूप से तारीफ़ के काबिल, दूर की सोच वाला और समय की ज़रूरत को पहचानने वाला है। 

ऑटो- रिक्शा ड्राइवरों के लिए मराठी जानना ज़रूरी करने का यह फैसला सिर्फ़ एडमिनिस्ट्रेटिव नहीं, बल्कि एक कल्चरल कमिटमेंट है। रोज़गार की तलाश में कई राज्यों से बहुत से लोग महाराष्ट्र आते हैं। यह एक अच्छी बात है; क्योंकि महाराष्ट्र ने हमेशा सभी को प्यार से अपनाया है। लेकिन, इस धरती पर बसने के साथ ही, यहां की भाषा और संस्कृति से घुलना-मिलना और उनका सम्मान बनाए रखना भी सभी की ज़िम्मेदारी है। कभी- कभी, लोकल भाषा या व्यवहार के प्रति बेपरवाही देखी जाती है जिससे बातचीत में बेवजह तनाव पैदा होता है, जो चिंता की बात है।

रिक्शा और टैक्सी ड्राइवर शहर की रोज़मर्रा की ज़िंदगी की अहम कड़ी हैं। उनका बिज़नेस नागरिकों से सीधे बातचीत पर आधारित है। ऐसे में, लोकल भाषा का ज्ञान होना सिर्फ़ सुविधा नहीं, बल्कि ज़रूरत है। अगर आपको मराठी का ज्ञान है, तो आप यात्रियों से अच्छी तरह बातचीत कर सकते हैं, गलतफ़हमियों से बच सकते हैं और अपनी सेवा को ज़्यादा अच्छे से बता सकते हैं।

मुख्यमंत्री ने भी इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया है और साफ़ कहा है, 'मराठी सीखो, हम सिखाने को तैयार हैं'। यह रुख सख़्त होने से ज़्यादा गाइड करने वाला और सबको साथ लेकर चलने वाला है। यह बात कि सरकार खुद भाषा की पढ़ाई के लिए पहल करने को तैयार है, इसके पीछे की पॉज़िटिविटी का संकेत है।
खास बात यह है कि राज्य सरकार ने 1 मई से इस फ़ैसले को लागू करने का फ़ैसला किया है। इसमें कोई शक नहीं कि महाराष्ट्र दिवस के मौके पर शुरू होने वाला यह प्रोएक्टिव कदम मराठी भाषा की शान को और मज़बूत करेगा।

यह फ़ैसला किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ नहीं है, बल्कि मराठी भाषा के सम्मान और सामाजिक मेलजोल के लिए है। महाराष्ट्र में रहने वाले हर व्यक्ति की नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वह यहाँ की संस्कृति और भाषा का सम्मान करे। मराठी सीखना सिर्फ़ बातचीत का ज़रिया हासिल करने के बारे में नहीं है, बल्कि इस ज़मीन की भावना से जुड़ने के बारे में भी है।

सरकार के इस फैसले से मराठी लोगों के आत्म- सम्मान को नई ऊर्जा मिलेगी और सामाजिक एकता को बढ़ावा मिलेगा। ऐसे ठोस और संवेदनशील फैसलों की वजह से ही 'मराठी' सिर्फ एक भाषा नहीं, बल्कि पहचान, गर्व और एकता की जीती-जागती पहचान बन गई है।
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