पैसा या इन्सानियत ? रिश्तों की आड़ में चलने वाला मतलबी खेल
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आज के इस कलियुग में स्वार्थ से भरे परिवार के रिश्तों की गहराई में एक कड़वा सच छिपा हुआ है। अब माता-पिता के लिए भी सिर्फ दो ही वर्ग होते हैं ‘पसंदीदा’ और ‘नापसंदीदा’। इन दोनों के बीच की खाई इतनी गहरी हो गई है कि उसमें कर्तव्य, त्याग, समर्पण और मानवता के सारे नियम गुम हो गए हैं।
आज के कलियुग का यह विचित्र गणित ऐसा है कि लाडलों की हजार गलतियाँ आसानी से माफ हो जाती हैं, लेकिन जो लाडला-लाडली नहीं है, उसने हजारों त्याग किए हों तो भी वे मिट्टी के मोल हो जाते हैं। जो पसंदीदा है, वह सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर हो तो भी उसकी एक झलक या साधारण याद माता-पिता के मन को छू जाती है। लेकिन जो बेटी या दामाद संकट के समय छाया की तरह खड़े हो जाते हैं, जो बिना कुछ बोले हर मुश्किल में साथ देते हैं, उन्हें सिर्फ ‘उपयोगी साधन’ या ‘मूर्ख’ समझा जाता है।
अस्पताल के वे एक-एक पल जब खून के रिश्तेदारों और बहू ने मुँह फेर लिया, तब बड़ी बेटी और उसके पति ने अपनी सारी लगन और कर्तव्य निभाया। लेकिन बदकिस्मती यह कि समय पर पहुँचने वाली ‘बड़ी बेटी’ को धिक्कारा गया, जबकि छोटी बेटी को दुनिया की डायरी में ऊँचा स्थान मिल गया। सिर्फ इसलिए कि उसके पास ‘चेक-पैसा’ और ‘बैंक बैलेंस’ था। उस वक्त न समय की कदर हुई, न खून की खिंचाव की — कदर हुई सिर्फ पैसे के पाकेट की। आजकल माता-पिता को भी वही बेटी या बेटा ‘श्रवणकुमार’ लगता है जिसका वेतन और बैंक बैलेंस सबसे मोटा होता है।
जिन्हें हम नापसंद करते हैं, उनके लिए हम अपना सब कुछ बेचकर, सिर पर कर्ज लेकर मदद करते हैं, फिर भी उन्हें उसकी कोई कीमत या कदर नहीं होती। क्योंकि सामने वाले की नजर में हमेशा पसंदीदा संतान ही श्रेष्ठ होनी चाहिए। “हम किसी के लिए कितना करते हैं, उससे ज्यादा अब यह मायने रखता है कि हम उनके लिए ‘कौन’ हैं।”
संक्षेप में कहें तो, आज के समय में इंसान की कदर बिल्कुल नहीं बची है। अब कदर सिर्फ नजर में ‘पसंद’ और जेब में ‘अमीर’ की है। जो संकट में ढाल बनकर खड़ा होता है, उसे सबसे पहले नजरअंदाज किया जाता है। नजदीकी इंसान की मानवता हमेशा सस्ती पड़ती है, जबकि दूर के लेकिन पसंदीदा बेटे-बेटी का प्यार महँगा लगता है।
आज मैं अपनी आत्मा की गहन गहराई से एक ऐसी पीड़ादायक और हृदयविदारक कहानी आपके सामने रख रहा हूँ, जो अनगिनत घरों में चुपचाप घटित होती है, लेकिन शायद किसी के होंठों पर आती भी नहीं है। यह कहानी उस अदृश्य त्याग की है, जो आँखों को दिखाई नहीं देता, जो पूरे परिवार की नींव को चुपचाप संभाले रखता है।
शहर में ७० वर्ष की उम्र में पत्नी के लिए नया घर बनाने के लिए बड़े दामाद ने हिम्मत दी “कहीं कमी पड़ी तो मैं हूँ ”। खास बात यह कि ४० साल से पत्नी घर बनाने का रट लगाती रही, लेकिन हिम्मत कभी नहीं हुई, वह भी सरकारी नौकरी होने के बावजूद भी। पर बड़े दामाद ने हिम्मत दी, फिर तीनों बच्चों ने समान रकम दी। बेटे और छोटी बेटी ने अपनी बचत से दी, जबकि बड़ी बेटी ने माँ का सपना पूरा करने के लिए बिना पी आगे-पीछे देखे बैंक से लाखों का कर्ज लिया। महीने का हप्ता भरने की ताकत न होने के बावजूद उसने खाजगी बँक से ज्यादा टक्के पर ऋण लिया। कुछ महीने बाद पिताजी ने बडी बेटी से फिर माँग उठायी “पचास हजार रुपये कर्ज निकालो, मैं (पिताजी) महीने का हप्ता और पूरा कर्ज चुकता कर दूँगा।” लेकिन पैसे निकालने के बाद एक भी महीने का हप्ता या कर्ज माता-पिता की तरफ से दिया नही गया और बाद में उस कर्ज का कभी नाम भी नहीं लिया।
इस दौरान बड़ी बेटी को अपना घर चलाना, बेटी की पढ़ाई का खर्च, जिम्मेदारियाँ और पति के लिए खेती खरीदने का सपना कभी पूरा नहीं हो सका। लेकिन माता-पिता का घर बने, इस सपने के लिए बड़ी बेटी कर्ज में डूबती गई और पति का खेती का सपना खत्म हो गया। बैंक में कर्ज की दोगुनी रकम चली गई, यानी पाँच लाख का कर्ज निकाला तो जेब से दस लाख गए। बैंक ने ब्याज सहित पैसा लिया। पति की इच्छा अनुसार खेती के लिए जमा म्यूचुअल फंड की रकम भी चली गई। पैसा, मेहनत, त्याग, पड़ोसियों से झगड़े, मारपीट, गुंडों का सामना यह सब बड़ी बेटी के पति को झेलना पड़ा। फिर भी दूर की बेटी-बेटे को रेडीमेड उपकार और इनाम मिले क्यूँकी वो माता पिता के लाडले थे।
छोटी बेटी और बेटे द्वारा दी हुई रकम तो हमेशा माता-पिता के मुँह पर रहती है। लेकिन जिसने अपना खून-पसीना एक कर पर्सनल लोन लिया, बैंक में ब्याज सहित दोगुना भुगतान किया, म्यूचुअल फंड बेचा, कर्ज चल रहा था- फिर भी माता-पिता ने फिर पचास हजार रुपये सोसाइटी से कर्ज लेने को कहा “मैं (पिता) महीने का हप्ता दूँगा.. खुद पुरा ऋण चुकता करूँगा” ऐसा कहा, लेकिन वर्षों तक सोसाइटी के ऋण का एक भी पैसा कभी नहीं दिया गया। उल्टा यह कर्ज भी ब्याज सहित पूरी रकम बड़ी बेटी ने चुकाई। घर बनाने के दौरान पेट्रोल के लिए महीने में पाँच हजार रुपये खर्च कर पाँच साल में तीन लाख रुपये गए, फिर भी उनकी मेहनत, रात की नींद और अंतर्मन की चिंता की ओर किसी का भी ध्यान नहीं गया। यह बहुत आश्चर्य की बात है। यह त्याग करने वाली बड़ी बेटी और उसका पति था।
माँ का नया घर का सपना तो नाटक ही था। असल में वह बेटा-बहू और छोटी बेटी के लिए ही घर बनवाना था (माता-पिता का उन दोनों बच्चों को शहर में घर देना ही उद्देश्य था)। लेकिन बेटा सरकारी नौकरी पर होने के बावजूद माता-पिता का सपना पूरा नहीं कर सका और न खुद प्लॉट लेकर घर बना सका यह उसकी नाकामी को छुपाने की कोशिश थी- पिता ने ७५ वर्ष की उम्र में बेटे के लिए घर बनाकर उनकी पत्नी का सपना है यह सिर्फ दिखावा था।
बड़ी बेटी और उसके पति की निरंतर सेवा और अथक मेहनत भी नजर अंदाज कर दी गई। पेट्रोल के खर्च के लिए पाँच साल महीने में पाँच हजार रुपये बड़ी बेटी ने अलग रखे, फिर भी उसे “सिर्फ थोड़ा सा” कहकर टाल दिया जाता है। तीन लाख “थोड़े से” होते हैं, वह भी पेट्रोल खर्च।
घर बनाना एक खेल था, क्योंकि आसपास के लोग घर नहीं बनने देंगे, यह बात बडी लडकी के माता-पिता को पता था। पर अपने लाडले बेटे को इस संकट में पड़ने नहीं देना था। लेकिन जिंदा रहते बेटा-बहू के लिए घर बनवाना था, इसलिए नापसंद बड़ी बेटी के पति को निशाना बनाया गया। आसपास और पिछली पड़ोसियों के साथ झगड़े होंगे, खूनखराबा होगा तो वह होगा; लेकिन मेरा बेटा-बहू और छोटी बेटी तो सुरक्षित रहेंगे। इसलिए भावनात्मक खेल खेला गया -“माँ का सपना है, घर बनाना है। " बड़ी बेटी का पति भावुक था, इसलिए वह भूल गया कि सत्तर वर्ष की उम्र में घर बनाने का असली सपना किसका है? आसपास के लोगों के झगड़े उसे पता नहीं थे। और आसपास वालों ने तो कसम खाई थी कि इन्हें यहाँ घर बनाने नहीं देंगे, भले किसी की जान लेनी पड़े तो भी चलेगा।
लेकिन इस खेल से बड़ी बेटी का पति अनजान था। निर्माण कार्य शुरू होने पर आसपास वालों के साथ मारपीट, झगडे, पुलिस स्टेशन, गाली-गलोच, जान से मारने की धमकियाँ यह सब बड़ी बेटी के पति ने अकेले सहा। बेटा-बहू या छोटी बेटी को इन झगड़ों से अलग रखा गया। उन्होंने कभी दामाद से पूछा नहीं या मध्यस्थता नहीं की। हालांकि निर्माण कार्य के मामले में हस्तक्षेप जरूर किया था।
एकादिन बडी लडकी के पिता को रात तीन बजे हार्ट अटैक आया तब बड़ी बेटी और दामाद ने ही तुरंत अस्पताल में भर्ती किया। ससुर का कहना था कि मेडिकल ले जाओ, वहाँ पैसे नहीं लगते। लेकिन अस्पताल की तीसरी मंजिल से ऊपर-नीचे दौड़ते-दौड़ते थक चुके दामाद को एक कदम आगे चलना भी मुश्किल हो गया, फिर भी बाहर की दवा की दुकान से इंजेक्शन, दवाइयाँ, डायपर, लैब टेस्ट- डॉक्टरों को दौड़-दौड़कर लाकर दामाद ने अपना आधी जान निकाल दिया।
तीसरी मंजिल से १५-१५ बार ऊपर-नीचे किया। जब थोड़ा रिस्क कम हुआ तब बेटा और बहू सुबह ९:३० बजे आए। फिर उनकी बहू ने दामाद को सेप लाने को कहा। जब वे ऊपर आए तब खुद क्यों नहीं लायी ? यानी एक इंसान अस्पताल के बेड पर प्राण त्याग रहा है और दूसरा इंसान ऊपर-नीचे दवाइयाँ लाते, सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते थककर प्राण त्याग रहा है। किसी ने कदर की? और उस समय दामाद की बेटी की परीक्षा भी चल रही थी। अच्छे इन्सान का फायदा उठाया इसलिये भगवान ने चेतावणी दी और बचाया भी वही अच्छे इन्सान ने याने बडी बेटी और बडे दामाद ने।
घर आकर ससुर कहते हैं कि मेडिकल में पैसे नहीं लगते — तीन बार बोले। दामाद ने उनका मन रखा। लेकिन सच यह था कि सिर्फ एडमिशन फी बेड चार्ज नहीं लगा, बाहर से लाई गई सारी दवाइयाँ, डायपर के चार बड़े पैकेट, लैब टेस्ट — कुल सात हजार रुपये अपनी जेब से खर्च हुए थे, फिर भी ससुर कहते हैं, “अरे, मेडिकल में पैसे कहाँ लगते हैं?” बडे दामाद ने बिल नहीं लिया क्योंकि बिल लेते लेते ५-७ सेकंड लग जाते, तब १-१ सेकंड महत्वपूर्ण लगता था। फिर दामाद और बड़ी बेटी बस इतना ही कहते हैं, “कुछ नहीं लगा। क्योंकि बड़े लोगों का मन रखना तो जरूरी है ना।” और अस्पताल से अभी-अभी आए, बेकार पैसे का टेंशन उन्हें नहीं देना।
सबसे हृदयविदारक पल वह था जब सरकारी अस्पताल से प्राइवेट अस्पताल में शिफ्ट किया गया। बहू को अस्पताल के रिसेप्शन ने बुलाया, “नीचे जाकर तुरंत पैसे जमा करके आओ।” लेकिन उस रिश्तेदार ने ध्यान नहीं दिया। तब पुना वाले छोटी बेटी और छोटा दामाद उस अस्पताल में ही थे। लेकिन जब बड़े दामाद आईसीयू की तरफ मुड़े, तब रिसेप्शनिस्ट ने उन्हें रोककर पूछा, “आप इनके साथ हैं क्या?” बड़े दामाद ने हाँ कहा। नर्स की आँखों में गुस्सा और असहायता साफ दिख रही थी “आधा घंटा हो गया, नीचे पैसे भरने को कहा था, अभी तक नहीं भरे। पैसे भरे बिना ऑपरेशन नहीं होगा।” उस महिला को (हाथ दिखाकर) बताए आधा घंटा हो गया, मरीज की जान बचानी है या नहीं?
बड़े दामाद ने एक पल भी बर्बाद न करते हुए कहा, “मैं दो मिनट में पैसे भरकर आता हूँ।” फिर अपनी पत्नी (बड़ी बेटी) की तरफ मुड़कर बोले, “जल्दी नीचे एटीएम कार्ड लेकर जाओ काउंटर पर पैसे जमा करो और वो फाईल देंगे दवाईया भी लेकर आओ।”
बड़ी बेटी ने नीचे काउंटर पर सत्रह हजार रुपये जमा किए और अलग पैसे देकर दवाइयाँ भी लाईं, पैसे जमा होने की पुष्टि होने पर ही ऑपरेशन शुरू हो सका। उस समय परिवार में किसी को भी सच्ची चिंता नहीं थी। उस पल मन में क्या चल रहा था, यह सिर्फ बड़ी बेटी और उसके पति को ही पता था।
इधर ससुर अस्पताल में भर्ती, लेकिन उधर छोटी बेटी और भाई-बहू निर्माणाधीन घर बेचने का प्लान करते हैं। वे तीनों (बेटा और दो बेटियाँ) बैंक के हाउसिंग लोन का समान भुगतान करेंगे ऐसा तय करते हैं, लेकिन बड़ी बेटी इस कर्ज को चुकाने में असमर्थ दिखाती है क्योंकि उसी घर के लिए निकाले गए कर्ज के दो अलग-अलग बैंकों में हप्ते भरने शुरू हो चुके थे। फिर घर बेचने का फैसला हुआ लेकिन तब बड़े दामाद कहते हैं, “मैं दुकान बेचने नहीं दूँगा, बाकी आप देख लो।” और यह बात बड़े दामाद छोटे दामाद से फोन पर कहते हैं कि दुकान छोड़कर आप जो फैसला करना है कर लो, मेरा विरोध नहीं है। तब उन्हें लगता है कि दुकान न बेचने देने वाला यह कौन है? हम इस नए घर के मालिक हैं, फिर उसकी माँ कहती है दुकान बड़े दामाद को दी गई, फिर उसमें बेटा और छोटी बेटी फिर फाटे फोड़ते हैं।
सास-ससुर का घर बनाते समय पड़ोसियों से कितने झगड़े, कितनी चीख-पुकार, पुलिस स्टेशन और मारपीट हुई। फिर भी “बड़ा दामाद ही बुरा” ऐसा ठप्पा लगा दिया गया। लेकिन जब बड़ी बेटी ने पिता के लिए कर्ज निकालकर पैसे दिए, तब वह कर्ज खुद बेटी को चुकाना पड़ा। जबकि छोटी बेटी और बड़े बेटे ने अपनी जेब से मदद की (जमा पूँजी से), इसलिए उनकी मदद को स्वर्ग से भी ऊँचा स्थान दिया गया। तीनों बच्चों ने घर बनाने के लिए समान रकम दी, लेकिन कर्ज निकालकर ब्याज सहित दोगुना बोझ उठाने वाली बड़ी बेटी की मेहनत को कोई महत्व नहीं दिया गया।
पिता ने कभी एक बार भी बड़ी बेटी से प्यार से नहीं पूछा, “बेटी, कर्ज कैसे चुकती हो? कोई परेशानी तो नहीं?” लेकिन बड़े बेटे और छोटी बेटी द्वारा दी गई रकम का उदाहरण बार-बार दिया जाता है।
अगर बड़े बेटे और छोटी बेटी ने कर्ज निकालकर पैसे दिए होते, तो शायद उनकी रात की नींद उड़ गई होती, उनकी हर छोटी-बड़ी बात की नोटिस ली गई होती। लेकिन यहाँ तो साफ दिखता है जो दिखावा करता है, वही प्रिय लगता है।
बड़ी बेटी, जो नापसंदीदा है, उसे पिता की तरफ से बार-बार धमकी दी जाती है “अगर मैं बैंक की तीन किस्तें नहीं भरीं तो घर नीलामी में चला जाएगा। ना घर रहेगा, ना दुकान।” ये शब्द सुनकर आँखें भर आती हैं। जिसने खून-पसीना एक कर दिया, जिसने त्याग की मिसाल पेश की, उसी को “गलत” ठहराया जाता है। और जो सिर्फ पैसे ट्रांसफर करता है, उसे “सर्वश्रेष्ठ” कहकर सराहा जाता है।
बड़ी बेटी और उसका पति अपनी व्यस्तता से समय निकालकर माता-पिता (सास-ससुर) की सेवा करते हैं — दवाइयाँ, डॉक्टर, बैंक का काम, घरेलू जरूरतें — समय पड़ने पर मदद करते हैं। नए घर को पानी डालने से लेकर अपने कपड़े खराब करने तक, उनकी छोटी बेटी (नातिन) भी दादी-नाना के घर के लिए पानी डालती थी।
लेकिन बड़ी बेटी ने कभी दिखावा नहीं किया। जबकि अपनापन तो सिर्फ दूर रहकर “बहुत व्यस्त” रहने वाले बड़े बेटे और छोटी बेटी को दिखाया जाता है। क्योंकि इस कलियुग में माता-पिता भी अमीर बच्चों के ही हो गए हैं।
जब बड़ी बेटी की बेटी छोटी थी, तब यही माता-पिता छोटी बेटी के घर पुणे में ५-६ महीने तक रहते थे और उसकी बेटियों की पूरी देखभाल करते। लेकिन जब नागपुर आए, तब बड़ी बेटी को सिर्फ दो दिन की साथ मिलती थी। नागपुर की बेटी माता-पिता से कहती, “मेरे घर आओ, बेटी की देखभाल करो।” तो वे दो दिन आए और कहते, “यहाँ हमारे पास ही अपनी बेटी को छोड़ जाओ, शाम को ऑफिस के बाद ले जाना।” पसंदीदा और नापसंदीदा के बीच का यह फर्क मन को बहुत चुभता है।
यह कहानी किसी एक परिवार की नहीं है। यह लाखों बेटियों-बेटों, बहनों, भाभियों और उन त्यागी संतानों की है, जो परिवार के लिए अपना सब कुछ अर्पण करते हैं, लेकिन उनका त्याग परिवार के मुखियाओं द्वारा नजरअंदाज कर दिया जाता है।
परिवार सिर्फ पैसा नहीं होता- वह मेहनत है, अपनापन-जिव्हाला होता है। रात- दिन की बेचैनी है, स्वास्थ्य की होरपल है और चुपचाप किए गए त्याग का समुद्र है। जब इस मेहनत को “दिखता ही नहीं” कहकर खारिज कर दिया जाता है, तब मन दुखता है।
आज मैं इस लेख के माध्यम से हर ऐसे परिवार को बताना चाहता हूं जिनका त्याग होता है, उनके मन को समझो। उन्हें प्यार से अपने करीब लाओ। शब्दों और कर्मों में उनका सम्मान करो। शायद तुम्हारी अपेक्षा त्याग करने वाले को इस अपनापन की बहुत ज्यादा जरूरत होगी।
क्योंकि पैसा तो गिना जा सकता है, लेकिन त्याग कभी नहीं गिना जा सकता - जिसने चुपचाप अपना सब कुछ तुम्हारे सपने के लिए अर्पण कर दिया, उसे कभी मत भूलना। जैसे तुम्हारे सपने को पूरा करने के लिए मदद चाहिए, वैसे ही उन्हें भी अपने सपनों को पूरा करने के लिए आपके मदद की जरुरत है, क्योंकि आखिरकार इंसान ही इंसान की मदद करके आगे बढ़ सकता है। बाहर के मंदिर के कार्यकारी को बड़ा करने की बजाय जान बचाने वाले और तुम्हारा सपना पूरा करने वाले उस देव-इंसान को बड़ा करो, क्योंकि उस आत्मा में ही सच्चा भगवान है। और तुम पर किए गए उपकार की वापसी करो। जिस पर अन्याय हुआ है, उसे न्याय मिलना चाहिए। मंदिर में दान करके भी देव अन्याय की मुक्ति नहीं होने देंगे। तबियत खराब होना भगवान ने उस व्यक्ती का इस्तेमाल करने के पाप की सजा है की अब सुधर जाओ क्यूकी अस्पताल वही इन्सान लेकर गया उसीने भगवान के सामने हाथ जोडे फिर भगवान भी क्यूँ नहीं सुनेगा एक चान्स तो बनता ही है।
- डॉ. शेखर दंताळे
नागपुर, महाराष्ट्र.