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मेरा कार्य ही मेरा सेवाधर्म है : जगदीश खरे (गोताखोर)

                       

नागपुर। 'दुर्घटना में मृत्यु जैसी शोकमय स्थिति कभी भी किसी पर भी आ सकती है। कई बार दुर्घटना में और विशेषकर पानी में डूब कर मरने वाले व्यक्ति के शरीर की स्थिति ऐसी हो जाती है कि लोग उसके करीब जाने में भी संकोच करते हैं। ऐसे में जलाशयों से शव निकालकर उनके परिजनों या पुलिस को सौंपने का जो कार्य मैं पिछले 32 वर्षों से कर रहा हूँ, उसे मैं अपना सेवा धर्म समझता हूँ। इस अभियान में मेरी पत्नी जयश्री खरे भी मेरे साथ जुड़ी हुई हैं'। ये उद्गार थे गोताखोर जगदीश खरे के जो उन्होंने विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मेलन के कार्यक्रम 'संवाद' में साहित्यकार डॉ. सागर खादीवाला से खुलकर बात करते हुए व्यक्त किए। 

अभी तक 4000 से अधिक शवों  को जलाशयों से निकालने वाले जगदीश खरे ने बताया कि एक बार उनका एक मित्र तालाब में डूब गया।चार मित्रों की सहायता से उसके शव को बाहर निकाला और तभी से जलाशय में डूबे हुए शवों को बाहर निकालने के कार्य को अपना सेवा धर्म बना लिया। समाज ने उनके सेवाभाव को समझा और कई प्रतिष्ठित सम्मान आपको प्राप्त हुए। लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज हुआ तथा दिल्ली के कार्यक्रम में अभिनेता अक्षय कुमार ने इन्हें एंबुलेंस खरीदने के लिए 5 लाख रूपये भेंट किये। इस दौरान आये अनुभवों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने श्रोताओं के प्रश्नों और जिज्ञासाओं का समाधान किया। 
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