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सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का शिक्षक मंच : एस एन विनोद


नागपुर। विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभा कक्ष में *नागपुर वैचारिक मंच* द्वारा सोशल मीडिया का प्रभाव विषय पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ संपादक पत्रकार एस एन विनोद ने सोशल मीडिया को अभिव्यक्ति का सशक्त मंच कहा। उन्होंने आगे कहा कि सी जी आई की कॉकरोच, परजीवी की टिप्पणी को लेकर शुरू हुई चर्चा/ विमर्श, देश के प्रधानमंत्री विदेश में होने पर ही इस माध्यम का सहारा लेकर जवाब भी दिया और पक्ष भी रखा। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस माध्यम में दुरुपयोग भी हो रहा है। उसकी चिंता व्यक्त की और कहा इसकी स्वतंत्रता से आज लोकतंत्र स्थापित है। 

इस क्रम में लेखिका और अनुवादक नेहा भंडारकर ने सोशल मीडिया को ज्ञान का भंडार निरूपित करते हुए गांव के कलाकारों को मिलते हुए महत्व के साथ कॉरपोरेट संसार में इसका सदुपयोग हो रहा है। प्रस्तुत विषय की प्रस्तावना वरिष्ठ व्यंग्य कवि वा संयोजक राजेंद्र पटोरिया ने सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर सरकारी नियामक नियंत्रण के साथ बच्चों पर पढ़ते गलत प्रभाव का उल्लेख किया।

अग्रचिंतन के संपादक व समाजसेवी दुर्गा प्रसाद अग्रवाल ने माना सोशल मीडिया स्वतंत्र अभिव्यक्ति और कार्य क्षमता में उपयोगी सिद्ध हो रहा है । इसे वैज्ञानिक क्रांति समझा उन्होंने आम आदमी की व्यथा को कोई स्थान न देने पर सोशल मीडिया पर सवाल उठाए। क्योंकि व्यक्ति अच्छे बुरे कार्यों का मूल्यांकन स्वयं कर रहा है । पत्रकार टीकाराम साहू आजाद ने माना आज माध्यम से संबंधों में दूरी आ रही है ,जहां स्व नियोजन के साथ माध्यम की बदलती भूमिका पर विमर्श की जरूरत है। 

संपादक पत्रकार डॉ कृष्ण नागपाल ने एक महिला के व्यक्तित्व विकास की घटना का जिक्र कर कहा माध्यम ने उसके रंग रूप पर की गई टिप्पणियों से उसके आत्मविश्वास को गिराया। उन्होंने माध्यम के दुरुपयोग पर प्रश्न उठाया। संस्था के सहसंयोजक और चिंतक नरेंद्र परिहार का मत था कि माध्यम हमेशा अभिव्यक्ति के लिए रहा है। वह अपना स्वरूप बदल रहा है। आज के सोशल मीडिया में संवेदनाओं की कोई जगह नहीं है, पर विश्व को जोड़े रखने में यहअहम भूमिका निभा रहा है। आज इसके दुरुपयोग को रोकने हेतु सक्षम नियम पालक हर स्तर पर होना जरूरी है। 

वरिष्ठ लेखिका और चिंतक इंदिरा किसलय ने आज सत्ता पलट की क्रांतियों में सोशल मीडिया की अहम भूमिका के साथ चिंता व्यक्त की की आज हम आत्ममुग्धता में लिप्त हो मनोरोगी और बेचैनी के शिकार बन गए हैं।आज जरूरी है माध्यम में भाषा के सत्यापन और इतिहास के सत्यापन का नियंत्रण हो। लघु कथाकार, उद्यमी उषा अग्रवाल ने स्वीकार किया सोशल मीडिया ने रिश्तों के बदलाव के साथ सारा वक्त संक्षिप्त टिप्पणियों के पठन में जाता है। आज माध्यम सक्रियता के साथ अफवाहों के प्रसारक बन, सामाजिक क्रांति के संघर्ष बन माध्यम सामने आया है। बस जरूरत है बने हुए नियमों के सही पालन करवाने की। 

वरिष्ठ अधिकारी व समालोचक डॉ अनिल त्रिपाठी ने उनके पास 1975 के रेडियो लाइसेंस को बताते हुए फिल्मों के सेंसरशिप के उपयोग पर पक्ष रख  कहा आज के ट्रोल संस्कृति और सोशल मीडिया पर नियंत्रण का होना जरूरी है। उसे दुधारी तलवार न बनने दें, आज अकेलेपन के साथ बच्चों की भविष्य के साथ माध्यम बुरा असर भी डाल रहा है।  हम सोशल मीडिया को बंद भी नहीं कर सकते ,यह भी सत्य है। कार्यक्रम की अध्यक्षता नेहा भंडारकर ने की और कार्यक्रम का संचालक राजेंद्र कटोरिया ने और आभार टीकाराम शाहू ने माना।
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