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कंटीला एकान्त


चंचल प्रकृति 
अपने अंतस में समेट 
मौन निमंत्रण दे 
करा रही साक्षात्कार

आपाधापी अरु तप्ती धूप 
दायित्वों के कोलाहल में 
धूमिल बैंगनी आभा में 
मखमली चादर ओढ़े

क्षितिज के सिन्दूरी लेप से पूछ रहा 
क्या कत्ल हुआ ऋतु पावस का, या 
अँधेरों ने रहस्य का पर्दा तार तार किया
क्योंकि 
शाम का सुनहरा रूप
 
जीवित अहसास के साथ 
सौंदर्य समेटे मस्त मलंग सा 
कविता के शब्द को दव सा सुंदर बना 
आकाश के दोनों पट खोल 
मिलन की छुईमुई सी कली बन

उन्मुक्त स्मृतियों के कागजी नाव पर
उफनते भावनाओं के वाष्प वलय बन 
कहने को बाहें पसार बोली 
अब भीतर आ जाओ , अंधेरा ग्रसने लगा है 
हृदय के स्पंदन को प्रतिध्वनि के शोर में

सांझ को दार्शनिक नायक बना
अस्त होते छूटने और ढलने के बोध में 
अल्प विराम सा चन्द्र किरणों से रश्मि तक
आलोकित सफ़र में खुद की बुनियाद 
व्याप्त कर जुगनू सा प्रज्वलित हो 

एकान्त सफर का हमराही सा साथ साथ
परिवर्तन की दस्तक पर खड़े हो 
स्वयं, सहज, सुहाने, शाश्वत सफर को 
अवसाद के बोझिल मायावी झंकार से दूर
स्मृतियों के सप्तरंगी उत्सव में मौन रह 

नव ऊर्जा से आत्मा के झंझावती प्रवाह पर 
लौट आते हैं नव पल्लव से उजड़े लताओं में 
परम आनंद के चेतना मयी समीर के साथ 
अपने यथार्थ के श्रम से सराबोर स्वेद के 
दमकते कणों में क्यों आप नाहक मेरे साथ 
कविता में खोज रहे हो अपना खोया हुआ कंटीला एकान्त 

- नरेंद्र परिहार, 
   नागपुर, महाराष्ट्र 
काव्य 4857418715756470157
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