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संत ज्ञानेश्वर मंदिर में पुरुषोत्तम मास आयोजन भक्तिभाव पूर्वक संपन्न


नागपुर। हमारी संस्कृति में समस्त व्रत, उपवास, वार, उत्सव, त्यौहार, नैमित्तिक उपासना आदि चंद्र की गति पर किंतु ऋतुएं सूर्य की गति पर आधारित हैं। दोनों प्रकार की कालगणनाओं में मेल करने के लिए  पंचांग निर्माताओं ने प्रति तीन वर्षों में चंद्रमा का एक माह निश्चित किया, जिसे अधिक मास अथवा मलमास नाम दिया गया। प्रतेक माह में सूर्य एक एक राशि में प्रवेश करता है किंतु इस मास में सुर्य किसी भी राशि में संक्रमण नहीं करता इसीलिए इसे मलमास नाम दिया गया, जिसका कोई स्वामी या देवता नहीं। अतः मलमास अत्यंत दुःखी हुआ। कारण इस माह में विवाह, यज्ञोपवित आदि शुभ कार्य भी वर्जित माने गये। 
मलमास अपने इसी दुःख को दूर करने के लिए वह भगवान विष्णु की शरण में गया। 

भगवान विष्णु  उसे गोलोंक में भगवान  श्रीकृष्ण के पास ले कर गये एवं मलमास की सारी व्यथा सुनाई। मलमास  की व्यथा सुन पुरुषोत्तम  भगवान  ने उसे धैर्य देते हुए कहा कि यद्यपि इस माह में मंगलकार्य वर्जित हैं, तथापि अनेक पुण्य कर्म  कर अपने जीवन का उद्धार किया जा सकता है। पवित्र नदियों में स्नान, दान,व्रत, नियम पूजा पाठ प्रभु स्मरण करने से यह मास अत्यंत पवित्र माना जाएगा और प्रभु ने मलमास को अपना नाम पुरुषोत्तम मास नाम दिया। इस तरह प्रभुकृपा से अधिकमास, मलमास ने साक्षात परमेश्वर  का नाम पुरुषोत्तम मास पाया और जग में वंदनीय हुआ।

प्रति तीसरे वर्ष आने वाले इस पुरुषोत्तम  मास में न केवल संपूर्ण भारत में अपितु विश्व के जिस जिस कोने में भारतीय निवास करते हैं वहां वहां भगवान  पुरुषोत्तम की पूरे माह आराधना, अर्चना, पूजा, कीर्तन, नामस्मरण, भगवत् गीता, श्रीमद्भागवत  पठन आदि पुण्य कार्यों द्वारा मानव अपने जीवन का उद्धार करते है।।
भगवत् गीता में भगवान स्वयं कहते है- यो मामेव संमूढो जानाती पुरुषोत्तम् • स सर्वविदित भजति माम् सर्व भावेन भारत। • कारण भगवान को पुरुषोत्तम मानने से ही मनुष्य सर्वविद हो जाता है। अर्थात जब मनुष्य का मन क्षर संसार से हटकर भगवान में लग जाता है तभी वह भगवान  को अक्षर, उत्तम जान लेता है और तब उसके संपूर्ण कार्य स्वतः ही ईश्वर भजन बन जाते हैं।

अतः पुरुषोत्तम  मास के इस पावन पर्व पर हमारे बजाज नगर स्थित संत श्री ज्ञानेश्वर  मंदिर  में भी अत्यंत ही नियमबद्ध होकर पूरी भाव भक्ति के साथ श्री विष्णुसहस्त्रनाम, भगवत्गीता के पंद्रहवीं अध्याय पुरुषोत्तम योग एवं श्री रामरक्षा का पठन कर भक्तों ने पुण्य अर्जित किया।

अंतिम दिन पुरुषोत्तम भगवान के अभिषेक पूजन में अधिक से अधिक महिलाओ ने भाग लेकर पुण्य अर्जित किया। इस पूजन की सबसे बडी विषेशता यह रही कि संपूर्ण पूजन, अभिषेक आदि भी महिला पंडितों के द्वारा करवाया गया। जिनमें सौ सुनंदाताई चांदेकर, श्रीमती शोभा ताई लाखे, श्रीमती अनुराधा ताई देशपांडे, श्रीमती शर्मिलाताई महादेवकर, श्रीमती प्रतिभाताई कुलकर्णी के नाम उल्लेखनीय है। अभिषेक में श्रीमती संध्या अइय्यर के साथ समस्त उपस्थित  महिलाओ को भाग लेने का सुअवसर प्राप्त हुआ। अंत में प्रसादरूप भोजन से कार्यक्रम का समापन हुआ। सभी ने पूरे एक माह भक्ति भाव से पूजा अर्चना का आनंद पाया। इस पूरे आयोजन में मंदिर के समस्त कार्यकर्ता, भक्तो, भगिनियों का मनः पूर्वक सहयोग रहा।
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