बोझ और मन
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ऐसी जगह खाली करे,
जहां ये सुरक्षित रहें..
हर कंधा नहीं होता
सच उठाने लायक।
मन खोलना भी
कोई साधना नहीं,
कई बार
नासमझी होती है-
लोग सुनते नहीं,
तौलते हैं।
बोझ को लादना
और उतारना,
अपने आप में कला है,
वरना आदमी
चलता कम,
घिसटता ज़्यादा है।
हर उठाया हुआ बोझ
कर्तव्य नहीं होता,
और हर छोड़ा हुआ बोझ
पलायन नहीं..
समय ही बताता है
क्या सही था।
दुनिया का सबसे बड़ा बोझ
अपराधबोध होता है,
जो कंधों पर नहीं,
अंदर बैठता है,
और आदमी को
पैरालाइज कर देता है।
गलती एक बार होती है,
पर अपराधबोध
उसे बार-बार जीता है,
सज़ा बाहर नहीं,
भीतर चलती रहती है।
दुनिया माफ़ कर दे
तो भी कुछ नहीं बदलता,
जब तक मन
खुद को
क्षमा न कर दे।
इसलिए हल्का होना
ज़रूरी है,
लेकिन उससे पहले,
ये जा जानना ज़रूरी है
कि क्या उठाना है,
और कब उतारना है.!
मन का बोझ उतारने के लिए
सोचे देखे
फिर परखे,
क्यों कि
हर इंसान 'इतना अपना' नहीं
कि मन खोल दिया जाए।
बोझ अगर
गलत जगह रख दिया,
तो वह सहारा नहीं,
हथियार बन जाता है।
और मन-
अगर हर किसी के सामने
खोल दिया,
तो समझा नहीं जाता,
तौला जाता है..
इसलिए
हल्का होना जरूरी है,
लेकिन उससे पहले सही इंसान
और
सही जगह चुनना जरूरी है.!
दुनिया का सब से बड़ा बोझ
अपराधबोध रहता
आप को पैरालाइज कर देता।
ऊपर से ठीकठाक दिखनेवाले को
दुर्बल बना देता है
बोझ कोई भी हो,
गति को रोकता है
तो अपना बोझ
अपनी तरह से
संभालना पड़ता है,
फिर वो आप हो या
कोई और।
- राजेन्द्र चांदोरकर (अनिकेत)
नागपुर, महाराष्ट्र
