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ग़ज़ल


शायर  : डॉ समीर कबीर 

वस्ल  के पल को जो पलकों पे संजोया होगा 
वो  मेरे हिज्र  में उस रात न सोया होगा 

बीती यादों को जो आँसू में डुबोया होगा 
वो  मेरे हिज्र में उस रात ना सोया होगा 

उसने होंठों पे मेरा नाम सजा रक्खा है 
मेरे चेहरे पे मेरे यार का चेहरा होगा 

उसके गांव से तुम आए हो सुनाओ उसकी 
रास्ते में कहीं तुम ने उसे देखा होगा 

उस के होने से हुआ करते थे सारे मौसम 
वो नहीं है तो कहीं धूप न साया होगा 

फिर तेरा साया मुझे देख कहाँ ले आया 
कोई जंगल कोई दरिया कोई सेहरा होगा 

बेख़ुदी में भी उसे भूल ना  पाया है ‘समीर’
जो ख़ुदी हो तो ख़ुदा जाने के क्या क्या होगा
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