Loading...

आत्मसंघर्ष, आत्मालोचन और आत्मावलोकन से बनती है व्यंग्य की भाषा : डॉ. सेवाराम त्रिपाठी


व्यंग धारा समूह की ओर से 'व्यंग्य की भाषा' पर गोष्ठी का आयोजन

नागपुर। केवल भाषा से नहीं, बल्कि विसंगति और विडंबनाओं से व्यंग्य का सृजन होता है। बिना आत्मसंघर्ष, आत्मालोचन और आत्मावलोकन के व्यंग्य नहीं लिख सकते। व्यंग्यकार में साहस होना चाहिए। यह विचार डा. सेवाराम त्रिपाठी (रीवा) ने व्यक्त किए। व्यंग्यधारा समूह की ओर से व्यंग्य विमर्श गोष्ठी की श्रृंखला में 185वीं ऑनलाइन गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी का विषय 'व्यंग्य की भाषा ' था। 

इस अवसर पर डा. त्रिपाठी बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि डरा हुआ व्यक्ति चाहे और कुछ लिख ले, लेकिन व्यंग्य नहीं लिख सकता। व्यंग्य की भाषा अलग है और विनोद की भाषा अलग है। हास्य, मसखरी, मखौल की भाषा अलग है। व्यंग्य की ताकत बढ़ाने के लिए हास्य का इस्तेमाल होना चाहिए। व्यंग्य के बारे में कोई भाषा नीति नहीं है। इसलिए व्यंग्य की भाषा के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। 

परसाई जी ने भी व्यंग्य की भाषा के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा है। उन्होंने कहा कि भाषा को कमतर न आंकें। व्यंग्य और भाषा एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। व्यंग्य केवल व्यंजना भर नहीं है। कुछ तिर्यक, टेढ़ी और तिरछी बात कही जानी चाहिए। परसाई की तरह अभिधा में भी बात कही जा सकती है। व्यंग्य में आज इंटरनेट की भाषा आ गई है। जिंदगी की भाषा-बोली नहीं है। आज के अधिसंख्य तथाकथित व्यंग्यकार प्रतिरोध इतना ही करते हैं जिससे कोई नुकसान न हो, जबकि व्यंग्य समाज में जो गलत और अन्यायपूर्ण है, उसका विरोध करता है। व्यंग्य किसी को नहीं छोड़ता है। 

विशिष्ट वक्ता राजेंद्र वर्मा (लखनऊ) ने भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर आलोक पुराणिक तक की व्यंग्य की भाषा का विस्तृत विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि भारतेंदु की रचना में बोलचाल के शब्द हैं। कबीर ने भाषा को बहता नीर कहा। उन्होंने बालमुकुंद गुप्त, बाबू गुलाबराय, प्रेमचंद, अमृतलाल नागर, के पी सक्सेना, आलोक पुराणिक के व्यंग्यों की भाषा का जिक्र करते हुए कहा कि व्यंग्य की भाषा रोचक और मुहावरेदार और बोलचाल वाली शैली युक्त होनी चाहिए। भाषा और विचारों में पारस्परिक भूमिका हो। 

परसाई की भाषा पाठकों तक सीधे पहुंच जाती है। मॉडल भाषा बन चुकी है। व्यंग्य भाषा की व्यंजना शक्ति से ही निकला है। आज व्यंग्य का अर्थ है - आसान और बोलचाल की भाषा।उन्होंने कहा कि व्यंग्य में हास्य जरूरी नहीं है। प्रसंगवश आ जाए तो ठीक, लेकिन अंत धारदार व्यंग्य से होना चाहिए। व्यंग्य में हास्य व्यंग्य को भोथरा ही बनाता है। प्रसंगानुकूल भाषा का चयन करना चाहिए। उन्होंने परसाई के व्यंग्य अकाल उत्सव, तीसरे दर्जे के श्रद्धेय, शरद जोशी के व्यंग्य सरकार का जादू का जिक्र किया।

आरंभ में वरिष्ठ व्यंग्यकार रमेश सैनी (जबलपुर) ने व्यंग्य की भाषा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हरिशंकर परसाई ने व्यंग्य की एक अलग भाषा गढ़ी थी। शरद जोशी, रवींद्रनाथ त्यागी, श्रीलाल शुक्ल सभी की अलग-अलग भाषा थी। परसाई की तीखी भाषा है, तो जोशी की भाषा महीन है। इस अवसर पर उपस्थित विद्वान साथियों ने भी व्यंग्य की भाषा पर अपने विचार व्यक्त किए। अभिजित कुमार दूबे ने आभार व्यक्त माना। 

व्यंग्य विमर्श गोष्ठी का संचालन रमेश सैनी ने किया। संचालन सहभागिता डॉ. रमेश तिवारी की रही। व्यंग्य विमर्श गोष्ठी में ललिता जोशी, वीना सिंह, विवेक रंजन श्रीवास्तव, डा. मुकेश गर्ग असीमित, हनुमान प्रसाद मिश्र, डा. सुरेश कुमार मिश्र ‘उरतृप्त’, संतोष दिवाकर, डा. ब्रजेश त्रिपाठी, डा. किशोर अग्रवाल, भंवरलाल जाट, टीकाराम साहू 'आजाद' की उपस्थिति उल्लेखनीय रही
व्यंग 1117276208711481246
मुख्यपृष्ठ item

ADS

Popular Posts

Random Posts

3/random/post-list

Flickr Photo

3/Sports/post-list