मेरे बाबूजी
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अब सोचता हूं वाक़ई वे एकदम अलग थे
हमारे परिवार पर स्नेह की घनी छाया थे
वक़्त ज़रूरत सुरक्षा का बड़ा सरमाया थे
बोलते कम थे करते उससे बहुत ज़्यादा थे
हर किसी की उम्मीद से अधिक फ़ायदा थे
स्वाभिमान की कहें तो अडिग हिमालय थे
सदाचार की सोचूं तो वे सदैव शिवालय थे
वैसा विरल व्यक्तित्व अब कहीं दिखता नहीं
इसीलिए जेहन में कोई देर तक टिकता नहीं
ख्वाहिश यही सतत हमें उनका आशीष मिले
जीवन में कहीं सर न झुके यही दुआ विशेष मिले
- सत्येंद्र प्रसाद सिंह
नागपुर, महाराष्ट्र
