निःशुल्क शिक्षा और शिक्षा की उपलब्धता पर राष्ट्रीय बहस जरूरी : एस एन विनोद
नागपुर। विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मेलन के साकेत भवन में नागपुर वैचारिक मंच द्वारा 'वर्तमान में शिक्षा व्यवस्था' पर आयोजित परिचर्चा में अध्यक्षता करते हुए प्रोफेसर व चिंतक डॉ. मधुलता व्यास का मानना है कि शिक्षा पर राजनीति कम हो और विद्यार्थियों में भावनिक और भौतिक विचारों के साथ मानवीय संवेदनाओं का विकास जरूरी है। यहां भाषा मुद्दा नहीं, भाषा का संप्रेषण जरूरी है। वरिष्ठ संपादक और राष्ट्रीय चिंतक एस. एन .विनोद का मत था कि शिक्षा हर स्तर पर नार्वे देश के समान निःशुल्क हो, क्योंकि शिक्षा आज बेरोजगार पैदा कर रही है। रोजगारोन्मुख शिक्षा की उपलब्धता पर राष्ट्रीय बहस जरूरी है। शिक्षत देश आजादी के साथ 17% से 80% तो हो गए, पर शिक्षा रोजगार देने में समर्थ नहीं बन सकी। अधिकृत राष्ट्रभाषा के साथ उन्होंने व्यंग कसा के आज हम अंग्रेजी से मातृभाषा के अनुवादक रख रहे हैं, जबकि होना इसके विपरीत चाहिए था।
कार्यक्रम संयोजक और व्यंग्य कवि राजेंद्र पटोरिया ने कोचिंग के कुकुरमुत्तों से बढ़ते जाल के साथ, आंकड़ों के साथ शिक्षा के बजट पर प्रश्न खड़े किए। शिक्षा के 1994 के बाद हुए व्यवसाई करण पर दुख व्यक्त किया और पुनः गुरुकुल, मदरसे और सरकारी व्यवस्था की आवश्यकता पर बल दिया। वरिष्ठ लेखिका और चिंतक इंदिरा किसलय का मत था शिक्षा को 50% कौशल से जोड़ना जरूरी है। शिक्षा मुक्त हो, मातृभाषा में हो, भाषा की दुर्गति ना हो । उन्होंने कर्नाटक के सी एम के नए निर्देश की शिक्षा व्यवस्था के लिए इसरो के वैज्ञानिक की मदद मांगी ,ऐसे नेतृत्व की सोच की प्रशंसा की। मराठी भाषा साहित्यिक बलवंत भोयर ने शिक्षा के गिरते स्तर पर चिंता व्यक्त कर मानस शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता पर जोर दिया।
वरिष्ठ साहित्यकार धृति बेडेकर ने कोठारी कमीशन की चर्चा कर विदेशी शिक्षा के कान्वेंट कलचर पर प्रश्न खड़ा कर, विश्व के कुछ देशों को छोड़ अन्य देशों के मातृभाषा में शिक्षा पर समाधान व्यक्त कर कहा हमारी शिक्षा में सिद्धांत और व्यावहारिकता के तालमेल का अभाव है। अतः मानसिकता बदलने पर हमें जोर देना चाहिए। मंचीय कवि डॉ. सागर खादीवाला ने जनता में जागरूकता का अभाव है ,साथ में राजनीतिक हस्तक्षेप ने शिक्षा को व्यवसाय बना दिया है। तथा पूछा परंपरागत शिक्षा यूरोपीय प्रणाली कहां लुप्त हो गई। इसके साथ शिक्षाविद श्रीमती भरतिया ने शिक्षा को सामाजिक व्यवस्था और जनसंख्या की गिरावट से जोड़ा। युवा कवयित्री श्रीमती सुकेशनी ने सरकारी स्कूलों के बंद होने के साथ ,आरक्षण पर प्रश्न खड़े किए । समाज सेविका नीलिमा शर्मा ने शिक्षा का गिरते स्तर को तथा संस्कृति व परंपरा से दूर होने पर दुख व्यक्त कर जाति व्यवस्था के आरक्षण को भी एक मुद्दा बताया।
प्राध्यापक व्यंग्य कवि नीरज व्यास ने आज एग्जाम सेंटर को पुलिस छावनी बना दिया गया है, पर दुख व्यक्त किया। उनका मानना है की प्रश्न पत्र लीक क्यों हो रहे हैं, प्रश्न उठाना ही चाहिए। क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य सर्वांगीण विकास होना चाहिए। पत्रकार व्यंग्य कवि टीकाराम साहू का मत था अच्छी शिक्षा मिले यह हर विद्यार्थी का हक है और सरकार इसके प्रति आज संवेदनशील नहीं दिख रही है। संपादक व सहसंयोजक नरेंद्र परिहार ने शिक्षा के राजनीतिकरण पर जोरदार प्रहार किया और शिक्षा में योग्य विद्यार्थी को रोजगार न मिले इसलिए पेपर नीट जैसे किसी संगठन द्वारा प्रायोजित कर लीक किए जाते हैं। अतः यह बंद होना चाहिए। क्योंकि रोजगार कम है और शिक्षित आज अधिक हैं। अगला विषय 26 जुलाई को 'समाज और स्वास्थ्य' पर शाम तीन से पांच सम्मेलन के साकेत भवन में चर्चा आयोजित की जाएगी।