Loading...

पारखी नज़र


परख रही हैं पैनी नजरें,
समाज में आने वालों को।
आ रहे हैं जो दाग छुपाए,
खोज रही उन नक्कालों को।।

मुखौटे पहने भरे पड़े हैं,
ऐसे धूर्त रूपी रखवाले 
परखे भला कोई कैसे 
उन्हें जो हैं दिल के काले।।

लेकिन अब कुचलेंगे उनकी चालों को,
और उनके खयाली पुलावों का।
घुस आए हैं जो गंदे नालों से रोकेगें उनको  
और करेंगे इलाज उनके दिये घावों का।।
 
आनें न देंगे हम कभीअब समाज में 
ऐसे मतलबी और खुदगर्जों को।
जलाकर राख कर देगें हम,
उनके बुने हुए जालों को।।

शेर की खाल में घूम रहे हैं जो भेड़िए,
गलने न देंगे हम उनकी दालों को।
मिल गये हैं दुश्मन से ये हमारे,
भेजेंगे वापस वहीं पर इन दलालों को।।

- रामनारायण मिश्र
   नागपुर, महाराष्ट्र 
काव्य 291361625039887721
मुख्यपृष्ठ item

ADS

Popular Posts

Random Posts

3/random/post-list

Flickr Photo

3/Sports/post-list