प्रा. प्रणाली दहाटे ने संघर्ष से गढ़ा नेतृत्व
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शिक्षा, जज़्बे और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरक सफलता की कहानी
कुछ व्यक्तित्व पद से बड़े बनते हैं, तो कुछ अपने कार्यों से। कुछ को अधिकार प्रतिष्ठा देता है, तो कुछ अपने कर्म से अधिकार को ही प्रतिष्ठित कर देते हैं। सरकारी सेवा में प्रत्येक अधिकारी को जिम्मेदारी मिलती है, लेकिन जो अधिकारी संवेदनशीलता, ईमानदारी, दूरदृष्टि और मानवीय मूल्यों के साथ अपने दायित्व निभाते हैं, वही समाज की स्मृतियों में स्थायी स्थान बनाते हैं। ऐसा ही एक प्रेरणादायी व्यक्तित्व हैं प्राचार्या प्रणाली हीरामण दहाटे। 11 जुलाई उनका जन्मदिवस केवल शुभकामनाओं का अवसर नहीं, बल्कि संघर्ष, शिक्षा, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प से निर्मित एक प्रेरक जीवनयात्रा का उत्सव है। वर्तमान में वे महाराष्ट्र शासन के कौशल, रोजगार, उद्यमिता एवं नवाचार विभाग के अंतर्गत भंडारा जिले के साकोली औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान तथा राजुरा औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान की प्राचार्या के रूप में कार्यरत हैं। हजारों विद्यार्थियों के भविष्य को दिशा देने वाली इन संस्थाओं का नेतृत्व करते हुए उन्होंने प्रशासन में पारदर्शिता, अनुशासन, आधुनिक तकनीक के उपयोग तथा गुणवत्तापूर्ण कौशल विकास का उत्कृष्ट समन्वय स्थापित किया है। किंतु इस सफलता के पीछे संघर्ष की लंबी कहानी छिपी हुई है।
अमरावती के एक साधारण परिवार में उनका बचपन बीता। होली क्रॉस विद्यालय से प्रथम श्रेणी में दसवीं उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने शासकीय पॉलिटेक्निक, अमरावती से डिप्लोमा प्राप्त किया। इसके बाद स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाड़ा विश्वविद्यालय से विशिष्ट श्रेणी में अभियांत्रिकी की डिग्री तथा नागपुर स्थित जी.एच. रायसोनी अभियांत्रिकी महाविद्यालय से एम.टेक. की उपाधि अर्जित की। प्रत्येक शैक्षणिक चरण में उत्कृष्टता बनाए रखते हुए उन्होंने अपनी पहचान स्वयं निर्मित की। उनके पिता राज्य परिवहन महामंडल में बस परिचालक थे। चार बेटियों और एक पुत्र की शिक्षा का दायित्व निभाना आर्थिक दृष्टि से आसान नहीं था। छात्रवृत्ति ही उनके उच्च शिक्षा का आधार बनी। वे सदैव कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करती हैं कि यदि छात्रवृत्ति न मिली होती, तो शायद उच्च शिक्षा पूरी करना संभव नहीं होता। इसी कारण डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा शिक्षा और सामाजिक न्याय के लिए उपलब्ध कराए गए संवैधानिक अवसरों के प्रति उनके मन में गहरा सम्मान है। उनके पिता ने उन्हें धन नहीं, बल्कि संघर्ष करने की शक्ति, ईमानदारी और परिस्थितियों से हार न मानने का साहस दिया।
शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने पॉलिटेक्निक में व्याख्याता के रूप में अध्यापन आरंभ किया। अध्यापन के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी जारी रखी। विवाह के बाद भी उन्होंने अपने सपनों को जीवित रखा। वर्ष 2014 में उन्होंने शासकीय पॉलिटेक्निक व्याख्याता और आईटीआई प्राचार्य दोनों पदों की परीक्षा उत्तीर्ण की। किंतु 2015 में व्याख्याता पद के साक्षात्कार के समय गर्भावस्था के आठवें महीने में होने के कारण चिकित्सकीय सलाह और परिस्थितियों के चलते उन्हें वह अवसर छोड़ना पड़ा।कुछ ही समय बाद, प्रसूति के पश्चात पुनः दूसरे साक्षात्कार का बुलावा आया। शरीर पूरी तरह स्वस्थ नहीं था, गोद में मात्र बीस दिन का शिशु था, फिर भी उनके पति ने उन्हें साहस और विश्वास दिया। वे मुंबई पहुँचीं, साक्षात्कार दिया और अपनी अदम्य इच्छाशक्ति से सभी को प्रभावित किया। अंततः नियुक्ति पत्र प्राप्त हुआ और वर्षों का संघर्ष सफलता में परिवर्तित हो गया। उनके पुत्र का नाम उन्होंने ‘कौतुक’ रखा, क्योंकि वह उनके संघर्ष और सफलता दोनों का साक्षी बना।
2017 में उन्होंने चंद्रपुर स्थित कन्या औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान में प्राचार्य के रूप में कार्यभार संभाला। अनेक प्रशासनिक चुनौतियों के बीच उन्होंने संस्थान की गुणवत्ता, विद्यार्थियों का आत्मविश्वास, शिक्षकों के समन्वय और प्रशासनिक पारदर्शिता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। आठ वर्षों की सफल सेवा के पश्चात उन्हें वर्ग-1 अधिकारी के रूप में पदोन्नति मिली और साकोली में प्राचार्या का दायित्व सौंपा गया। आज वे विभाग में कर्तव्यनिष्ठ, निर्णयक्षम और विद्यार्थी-केंद्रित अधिकारी के रूप में सम्मानपूर्वक पहचानी जाती हैं। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता उनका सरल स्वभाव है। उच्च पद पर पहुँचने के बाद भी उन्होंने विनम्रता नहीं छोड़ी। विद्यार्थियों से आत्मीय संवाद, सहकर्मियों के साथ समन्वय, कार्य में अनुशासन तथा निर्णयों में पारदर्शिता ने उन्हें एक विश्वसनीय प्रशासक बनाया है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि गरीबी सफलता की अंतिम सीमा नहीं है। यदि अवसर, शिक्षा, परिश्रम और परिवार का विश्वास साथ हो, तो कोई भी बेटी ऊँचाइयों तक पहुँच सकती है।
प्रशासनिक दायित्वों के कारण सामाजिक गतिविधियों में निरंतर सक्रिय रहना संभव नहीं हो पाता, फिर भी उन्हें आंबेडकरी विचारों पर आधारित नाटक ‘कौन कहता है टक्का दिया?’ में अभिनय कर सामाजिक जागरूकता की सांस्कृतिक यात्रा का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला। चंद्रपुर में इस नाटक के सफल मंचन हुए और यह अनुभव उनके जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है। आज जब समाज में बेटियों की शिक्षा की आवश्यकता पर चर्चा होती है, तब प्रणाली दहाटे का जीवन स्वयं एक प्रेरक उदाहरण बनकर सामने आता है। संघर्ष उनकी यात्रा था, शिक्षा उनकी शक्ति बनी, जज़्बा उनकी पहचान बना और कर्तव्यनिष्ठा उनके व्यक्तित्व की वास्तविक पहचान। छात्रवृत्ति पर पढ़ने वाली एक छात्रा का वर्ग-1 अधिकारी बनकर हजारों विद्यार्थियों के भविष्य को दिशा देना निस्संदेह प्रेरणा का अद्वितीय उदाहरण है।
11 जुलाई के शुभ अवसर पर उन्हें हार्दिक जन्मदिवस की शुभकामनाएँ। ईश्वर उन्हें उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, सतत ऊर्जा तथा निरंतर सफलता प्रदान करे। उनके नेतृत्व में और भी अनेक विद्यार्थियों के सपनों को नई उड़ान मिले तथा शिक्षा और कौशल विकास के माध्यम से राष्ट्रनिर्माण की यह यात्रा निरंतर आगे बढ़ती रहे, यही मंगलकामना।
- प्रवीण बागडे
नागपुर, महाराष्ट्र
