शासकीय स्तर पर गाँव गांव और नगर नगर वाचनालय - पठन संस्कृति की जरूरत
नागपुर। विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभा कक्ष में नागपुर वैचारिक मंच, नागपुर द्वारा आयोजित ‘लुप्त होती पठन संस्कृति’ विषय पर परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यिक व गजलकार माधुरी राउलकर ने माना बहुत कुछ पा लेने की लालसा में आधुनिक तकनीकी ने पठन संस्कृति का नुकसान तो किया। कई स्तर पर पठन संस्कृति को अब बढ़ावा दिया जा रहा है। यहां तक की कैदियों को जेल में भी पुस्तक प्रदान की जा रही हैं ।
वरिष्ठ संपादक व पत्रकार एस. एन. विनोद ने माना पुस्तक आज महंगी हो गई हैं। पठन संस्कृति को बढ़ावा देने हेतु शासकीय स्तर पर गांव-गांव, और नगर- नगर वाचनालय के साथ, खेल संसाधनों को भी बढ़ावा देना चाहिए। ताकि ज्ञान के इस बदलते स्वरूप में क्षरण होती हुई पठन संस्कृति को बचाया जा सके।
कार्यक्रम संयोजक और व्यंग्य कवि राजेंद्र पटोरिया ने कहा पठन से यादास्त बढ़ती है।वरिष्ठ संपादक नीरज श्रीवास्तव ने कहा आज लेखकों की भरमार है, वहीं यह भी सच है की पठन संस्कृति कहीं लुप्त नहीं हो रही, क्योंकि पठन से ज्ञान बढ़ता है और यह आज दिख भी रहा है। वरिष्ठ अधिवक्ता ओ. डी. जैन ने कहा लेखकों द्वारा पाठकों को आकर्षित करने हेतु उनकी रुचि अनुसार, अपनी भाषा और संप्रदाय से ऊपर उठकर लिखना चाहिए।यह भी सच है संस्कृति लुप्त नहीं होती, दूसरी संस्कृति या बदलाव से प्रभावित होती है।
वरिष्ट शिक्षिका रंजना श्रीवास्तव ने गीता प्रेस के बंद होने पर जहां दुःख व्यक्त किया, वहीं अपने सांदीपनी स्कूल में निर्धारित समय पर अपने-अपने स्थान पर 10 मिनट पढ़ने की प्रवृत्ति को नियमित कर पठन संस्कृति को बढ़ावा देने हेतु एक स्वस्थ उपक्रम का स्वागत किया।
वरिष्ठ संपादक, समीक्षक नरेंद्र परिहार ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल माध्यम के प्रचार प्रसार से बदलती पठन संस्कृति का स्वागत करने का आह्वान किया और बच्चों में पठन संस्कृति को जागृत रखने हेतु सु संस्कृत वातावरण का बढ़ाने का निवेदन किया।
वरिष्ठ पत्रकार एस. पी. सिंह ने माना आज पठन कम हो गया है । इसके लिए पाठको में उदासीनता तो है ही, वहीं लेखकों की बदलती लेखन प्रणाली को भी जिम्मेदार माना।
मराठी के प्रख्यात साहित्यकार डॉ. बलवंत भोयर ने माना आज किताबें खरीदने की प्रवृत्ति घटी है, यहां तक की दिवाली विशेषांक खरीदने के प्रति भी उदासीनता बढ़ी है। इस पर हमें ध्यान देना होगा ।
वरिष्ठ संपादक, प्रकाशक पत्रकार कृष्ण नागपाल ने ए एल व्हील के माध्यम से बिकने वाली पत्र और पत्रिकाओं की खपत को ना के बराबर बिक्री बता कहा, आज पाठक नहीं है ऐसा नहीं है। बस पठन संस्कृती में और बुक खरीदने की प्रवृत्ति में बदलाव आया है। ई बुक के माध्यम से आज पढ़ने की प्रवृत्ति बढ़ गई है।
वरिष्ठ सेवा निवृत अधिकारी पारसनाथ शर्मा ने कहा आज का विषय जहां गंभीर है । वहीं हमें पठन संस्कृति को बढ़ावा देने हेतु अपने ही घर से आधा घंटा पढ़ने पढ़ाने की प्रवृत्ति को बढ़ाना होगा।
वरिष्ठ समीक्षक, कथाकार इंदिरा किसलय का दावा है कि आज भी 75% प्रिंटेड बुक पढ़ी जाती हैं । 25 प्रतिशत लोगों की पसंद माध्यमों के कंटेंट पढ़ने की जरूर बढ़ी है। इस बदलाव का हमें स्वागत करना होगा और यह सच भी जान लें की पुस्तक मेले में 7 लाख लोगों का भाग लेना पठन संस्कृति का दावा मजबूत करता है। उन्होंने अररिया बिहार में दिनकर जी की काव्य रचनाओं को दीवारों पर उकेरा जाना एक नए बदलाव की पहल बताया और सिंगापुर में पठन संस्कृति को जागृत रखने हेतु बच्चों को प्रलोभन भी दिए जाते हैं।
वरिष्ठ लेखिका धृति बेडेकर का मत की पठन संस्कृति में बदलाव आया है, जो नकारात्मक नहीं है। अब कागजों के लिए पेड़ों का काटना भी कम हो रहा है ,जो पर्यावरण के हित में ही माना जाना चाहिए।
कवि अनिल मालोकर ने भारतीय संस्कृति ज्ञान परिषद अमरावती की पहल याने छोटी-छोटी पुस्तकों को प्रिंट कर उन्हें बच्चों के स्कूल के माध्यम से आगे लाया जा रहा है, का जिक्र किया और कहा कि हमें इनका स्वागत करना चाहिए। उन्होंने माध्यमों में रील की उपयोगिता पर भी प्रकाश डाला।
वरिष्ठ संपादक, पत्रकार सुदर्शन चक्रधर ने माना आज जैन जी नहीं पढ़ रहे हैं, अखबार पत्रिका पढ़ने का दौरा खत्म हो रहा है। हमारी पीढ़ी की पठन संस्कृति की धरोहर की रक्षा हेतु हमें नए मार्ग खोजना होगा।
वरिष्ठ लेखक प्रकाश गोविंदवार ने दलित साहित्य के करोड़ों का व्यापार का उदाहरण देकर कहा पठन संस्कृति घटी नहीं बल्कि बढ़ रही है। वाचनालय जरूर बंद हुए हैं, परंतु पाठकों की रुचि के अनुसार प्रस्तुत लेखन का पाठको ने भी स्वागत किया है।
योग गुरु समाज सेवक गुरु कौशल का मत था पढ़ने से जानकारी मिलती है, ज्ञान नहीं। पुस्तके तो अजर अमर हैं, आनंद ही प्रदान करती हैं। अतः हमें इन्हें संजोना चाहिए।
कवयित्री रुबीदास के बाद वरिष्ठ संपादक, प्रकाशक दुर्गा प्रसाद अग्रवाल ने अपने सामाजिक उपक्रम के अंतर्गत उत्कृष्ट विशेषांक अग्र चिंतन के प्रकाशन की एक-एक प्रति सबको उपलब्ध कराई और कहा पठन संस्कृति के तौर तरीके बदल गए हैं । उन्होंने आगे कहा हमें आधुनिक बदलाव का पुर जोर स्वागत कर लेखन को रुचि अनुसार बदलाव प्रदान करना चाहिए। क्योंकि यह आज की जरूरत है।
कार्यक्रम की शुरुआत में प्रस्तावना कार्यक्रम संयोजक राजेंद्र पटोरिया ने रखी और आभार सह संयोजक नरेंद्र सिंह परिहार ने माना। अगला विषय 1 नवंबर 2026 को शाम 3:00 बजे ध्वनि प्रदूषण पर आयोजित होगा।
