भारतीय उच्च शिक्षा को प्रयोग नहीं, स्थिरता और स्पष्ट दिशा की जरूरत



बार-बार बदलती शिक्षा नीतियों, परीक्षा प्रणाली और मूल्यांकन से शिक्षक एवं विद्यार्थियों के सामने बढ़ रही चुनौतियां


भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था पिछले डेढ़ दशक से लगातार बदलाव के दौर से गुजर रही है। वर्ष 2013 में Credit Based System (CBS), 2016 में Choice Based Credit System (CBCS) और वर्ष 2020 में National Education Policy (NEP-2020) लागू होने के बाद विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम, परीक्षा पद्धति और मूल्यांकन प्रणाली में अनेक परिवर्तन किए गए हैं। शिक्षा में सुधार के उद्देश्य से किए गए ये प्रयास महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बार-बार होने वाले बदलावों ने शिक्षकों और विद्यार्थियों के सामने असमंजस की स्थिति भी पैदा की है।


नई शिक्षा प्रणालियों के कारण शिक्षकों को बार-बार प्रशिक्षण लेना पड़ता है। वहीं विद्यार्थियों को विषय चयन, क्रेडिट व्यवस्था, परीक्षा पद्धति और मूल्यांकन को समझने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कई विश्वविद्यालयों में सेमेस्टर प्रणाली, परीक्षा आयोजन और उत्तरपुस्तिकाओं के मूल्यांकन में भी एकरूपता का अभाव है, जिससे विद्यार्थियों की शैक्षणिक निरंतरता प्रभावित होती है।


NEP-2020 का प्रमुख उद्देश्य Multidisciplinary Education और विद्यार्थियों को अपनी रुचि के अनुसार विषय चुनने की स्वतंत्रता देना है। इसके लिए Academic Bank of Credits (ABC) की व्यवस्था भी की गई है। हालांकि, अनेक महाविद्यालयों में विषय चयन की वास्तविक स्वतंत्रता, क्रेडिट ट्रांसफर और विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में समानता सुनिश्चित करना अभी भी चुनौती बना हुआ है।


पाठ्यक्रम निर्माण में Board of Studies (BoS), Academic Council, Senate और Management Council जैसी संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। इनमें उद्योग विशेषज्ञों और बाहरी विषय विशेषज्ञों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है, ताकि शिक्षा को वर्तमान तकनीक, शोध और रोजगार की जरूरतों से जोड़ा जा सके।


उच्च शिक्षा की एक बड़ी समस्या शिक्षकों की कमी भी है। अनेक महाविद्यालयों में नियमित नियुक्तियों के अभाव में Clock Hour Basis (CHB) और Contractual शिक्षकों पर निर्भरता बढ़ रही है। इसके साथ ही Major, Minor, Open Elective (OE), Indian Knowledge Systems (IKS), Skill Enhancement Courses (SEC) और Value Addition Courses (VAC/VEC) के अंतर्गत शिक्षकों के Workload Allocation को लेकर भी स्पष्टता की आवश्यकता है।


AISHE (All India Survey on Higher Education) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में उच्च शिक्षा में विद्यार्थियों का नामांकन लगभग 4.50 करोड़ तक पहुंच चुका है। इसके बावजूद शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात, आधुनिक प्रयोगशालाओं, डिजिटल सुविधाओं और ग्रामीण महाविद्यालयों के बुनियादी ढांचे में सुधार की आवश्यकता बनी हुई है। Ministry of Education, NITI Aayog और NSO के आंकड़े भी डिजिटल सुविधाओं की असमान उपलब्धता की चुनौती को रेखांकित करते हैं।


आंतरिक मूल्यांकन (Internal Assessment) की विश्वसनीयता भी गंभीर विषय है। कई संस्थानों में आंतरिक परीक्षा में विद्यार्थियों को बहुत अधिक अंक मिलते हैं, जबकि विश्वविद्यालय की बाह्य परीक्षा में उनका प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहता है। इससे वास्तविक ज्ञान और डिग्री की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं। इसके लिए पारदर्शी मूल्यांकन, Assessment Audit और Moderation Board जैसी व्यवस्थाएं आवश्यक हैं।


दूसरी ओर, Professors of Practice और Industrial Fellowship जैसी पहलें उच्च शिक्षा को व्यावहारिक अनुभव से जोड़ने का अच्छा प्रयास हैं। QS World University Rankings 2026 और QS Asia Rankings 2026 में भारतीय विश्वविद्यालयों की बेहतर उपस्थिति उत्साहजनक है, लेकिन Wheebox की National Employability Report के अनुसार स्नातकों की रोजगारपरक क्षमता में अभी सुधार की आवश्यकता है। साथ ही भारत में Research and Development (R&D) पर निवेश बढ़ाना भी जरूरी है, ताकि शोध और नवाचार को प्रोत्साहन मिल सके।


आवश्यक है कि किसी भी नई शिक्षा नीति को देशभर में लागू करने से पहले Pilot Implementation के माध्यम से उसका परीक्षण और स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाए। विश्वविद्यालयों, उद्योग जगत और नीति-निर्माताओं के बीच नियमित संवाद स्थापित हो। शिक्षकों की पर्याप्त नियुक्तियां, डिजिटल संसाधनों का विस्तार, आंतरिक मूल्यांकन में पारदर्शिता और विद्यार्थियों को वास्तविक विषय चयन की स्वतंत्रता सुनिश्चित की जाए।


शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्रियां प्रदान करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में वास्तविक ज्ञान, कौशल, चिंतन क्षमता, शोध और रोजगार की योग्यता विकसित करना है। नीतियां बदल सकती हैं, सरकारें बदल सकती हैं, लेकिन विद्यार्थियों का भविष्य किसी प्रयोग का विषय नहीं बनना चाहिए। भारतीय उच्च शिक्षा को अब बार-बार के प्रयोगों के बजाय स्थिर नीतियों, गुणवत्तापूर्ण क्रियान्वयन और स्पष्ट दिशा की आवश्यकता है।


- डॉ. एस. बी. किशोर
   अध्यक्ष, अध्ययन मंडल (कंप्यूटर विज्ञान)
   गोंडवाना विश्वविद्यालय, गड़चिरोली


लोकप्रिय खबरें

श्री नागपुर गुजराती ब्रह्मसमाज में घट स्थापना

डांगे महिला महाविद्यालय में उद्यमिता प्रकोष्ठ का शुभारंभ

करवा चौथ उत्सव में महिलाओं ने बिखेरे रंग