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सोचा भी न था !



घना कोहरा
आवाजें
जानी-पहचानी मगर,  चेहरा हमने
पहचाना ना था।

हर एक ने यहां पहन रखा है नकाब,
खंजर किसी के हाथों
भी है,
यह पता न था।

हर कोई यहां दोस्त बनकर आया है मगर,
दोस्ती इस कदर निभाएगा,
ख्वाब में सोचा न था।

इस जंगल के
शोर- शराबे में,
मोर पंख लगा
कोई काग
रास रंग रचाएगा,
पता न था।

हाथों को हाथ ना सुझे ,
अमावस सी काली
है ये रात,
लाए हैं बारूद भी साथ,
यह पता न था।

है दोस्त बड़ा
बहुरुपिया,
अनेक मुखौटों में,
तुम्हारा वजूद तुमसे ही छीने,
इतना ज़ालिम होगा
मालूम न था।

प्रजातंत्र दिवस पे
देशभक्ति पर भी
ऐसा घिनौना
नृत्य होगा, 
सच
कभी सोचा न था।


- शिवनारायण आचार्य

नागपुर (महाराष्ट्र)

काव्य 394320684670334071
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