सोचा भी न था !
https://www.zeromilepress.com/2021/01/blog-post_929.html
घना कोहरा
आवाजें
जानी-पहचानी मगर, चेहरा हमने
पहचाना ना था।
हर एक ने यहां पहन रखा है नकाब,
खंजर किसी के हाथों
भी है,
यह पता न था।
हर कोई यहां दोस्त बनकर आया है मगर,
दोस्ती इस कदर निभाएगा,
ख्वाब में सोचा न था।
इस जंगल के
शोर- शराबे में,
मोर पंख लगा
कोई काग
रास रंग रचाएगा,
पता न था।
हाथों को हाथ ना सुझे ,
अमावस सी काली
है ये रात,
लाए हैं बारूद भी साथ,
यह पता न था।
है दोस्त बड़ा
बहुरुपिया,
अनेक मुखौटों में,
तुम्हारा वजूद तुमसे ही छीने,
इतना ज़ालिम होगा
मालूम न था।
प्रजातंत्र दिवस पे
देशभक्ति पर भी
ऐसा घिनौना
नृत्य होगा,
सच
कभी सोचा न था।
- शिवनारायण आचार्य
नागपुर (महाराष्ट्र)

