मनाली में एक दिन...
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दिग्भ्रमित चपल, बैरागी मन
अभ्यंतर अतृप्त प्यास लिए,
दर दर भटकता आस लिए,
पहुंचा हिमालय के सान्निध्य
दो पल सुकून की चाह लिए।
दूर - दूर दृष्ट शैल श्रृंखला
हिम आच्छादित सर्व शिखर ,
मन आल्हादित तन रोमांचित
नव यौवना प्रकृति हो गई निखर।
दूर क्षितिज दिक् दिगंतर
श्वेत आभुषण ओढ़े तरुवर,
चहुँ ओर तुषार, केवल तुषार
हिया डोले आमोद अपार।
घन तिमिर, चंचल चित्त
प्रचंड द्वंद्व तम-आलोक बीच,
हे विधाता, अपरिमित असीम,
अंतरतम पहुंचा तव आशीष।
- डॉ. शिवनारायण आचार्य
नागपुर (महाराष्ट्र)




