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छत्रपति शिवाजी महाराज के प्रशासन में पारदर्शिता थी : प्राचार्य डॉ शहाबुद्दीन शेख़




नागपुर/पुणे। छत्रपति शिवाजी महाराज एक शूर वीर, योद्धा तथा मराठा राजा थे। राष्ट्र की शान थे। उनके प्रशासन में पारदर्शिता थी ।इस आशय का प्रतिपादन राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष प्राचार्य डॉ शहाबुद्दीन नियाज़ मुहम्मद शेख़, पुणे ने किया।राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के तत्वावधान में छत्रपति शिवाजी महाराज जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित आभासी गोष्ठी में अध्यक्षीय उद्बोबोधन मे उन्होंने कहा।

राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना की मुख्य कार्यकारी अध्यक्ष श्रीमती सुवर्णा जाधव तथा महासचिव डॉ प्रभु चौधरी मंच पर प्रमुख रूप में उपस्थित थे प्राचार्य डॉ. शहाबुद्दीन शेख ने आगे कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज अपने प्रशासन में धर्म के ठेकदारों को कभी हस्तक्षेप का अवसर नहीं देते थे। धर्म व राजनीति में निरंतर समन्वय बनाए रखने में वे दक्ष रहते थे। छत्रपति जी ने अपने प्रशासन को लोकाभिमुख और भ्रष्टाचार मुक्त रखने का सफल प्रयास किया।समान वेश,समान वेतन,समान प्रतिष्ठा तथा सामूहिक भोजन के माध्यम से उन्होंने सामाजिक क्रांति करके दिखाई।विभिन्न धर्म व संप्रदाय के लोगों को साथ लेकर जात पात की दीवारें छत्रपति जी ने नष्ट कर दी थी।

मुख्य अतिथि तथा राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना की मुख्य कार्यकारी अध्यक्ष श्रीमती सुवर्णा जाधव ने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज की जन्मभूमि एवम् कर्मभूमि महाराष्ट्र रही है। परंतु वे न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे विश्व के लिए प्रेरणा स्त्रोत रहे है। अपने समय में छत्रपति जी को मैनेजमेंट गुरु के रूप में भी जाना जाता था। विशिष्ट अतिथि व राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के राष्ट्रीय महासचिव डॉ प्रभु चौधरी ने अपने मंतव्य में कहा कि छत्रपति जी का इतिहास अपने पराक्रमों के साथ मातृप्रेम, देश अभिमान, राष्ट्रप्रेम, स्त्री शक्ति सम्मान व उच्च नीति मूल्यों से ओतप्रोत रहा है। 

डॉ अशोक घोरपड़े, अहमदनगर ने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज उत्कृष्ट संगठक,मार्गदर्शक व जानता राजा के रूप में लोकप्रिय थे। स्वच्छ प्रशासन के साथ उन्होंने सामान्य जनों को आश्रय दिया था। ममता अहीर, रायपुर, छत्तीस गढ़ ने अपने उद्बोधन में कहा कि छत्रपति जी कुशल प्रशासक, निडर और सामान्य जनों के लिए मसीहा थे। वे हमेशा लोगों के दिल पर राज करते रहे। अष्टप्रधान की अवधारणा को उन्होंने स्वीकार किया था।

डॉ रीना सूराड़कर, औरंगाबाद ने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज के चरित्र में अनेक गुणों की भरमार थी। फिर भी मातृ भक्ति यह गुण उनमें प्रमुख रूप में था।
 गोष्ठी का आरंभ श्रीमती पूर्णिमा कौशिक, सचिव, छत्तीसगढ़ इकाई, रायपुर  द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना  से हुआ। महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष डॉ भरत शेनकर, राजूर ने अतिथि परिचय दिया। 

राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ रजिया शहनाज़ शेख़, बसमत नगर, हिंगोली ने अतिथियों का स्वागत किया। आभासी पटल पर डॉ मुक्ता कान्हा कौशिक, रायपुर, डॉ रश्मि चौबे, गाजियाबाद, श्री विजय प्रभाकर नगरकर, अहमदनगर, डॉ अरुणा शुक्ला, नांदेड़, डॉ सुजाता पाटील, म्हाडा, सुनीता चौहान, मुंबई सहित अनेक गणमान्य उपस्थित थे। अंत में राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना की राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉक्टर मुक्ता कान्हा कौशिक ने छत्रपति शिवाजी को नमन करते हुए चार पंक्तियां कही -
वीर योद्धा थे सेनानी थे,
कुशल बहुत वो ज्ञानी थे,
देश का गौरव मान बढ़ा,
ऐसे वो बलशाली थे।
कार्यक्रम के अंत मे सभी अतिथियों, पदाधिकारीयों का आभार व्यक्त किया।
साहित्य 5832388554643472103
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