तिरंगे का अपमान !
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माया-बन में खेलती, स्वर्ण हिरण की आस,
लखन रेखा पार कर, सीता हर गई आज,
अपना साधे स्वार्थ प्रथम, पर नत देश का नाम,
कुबुद्धि के फेर में हुआ निंद नीय काम ।
भूले संस्कृति, भूले मर्यादा,
भूले इतिहास और देश की शान,
विनाशकाले विपरीत बुद्धि
मचा हुआ कोहराम
आज जरुरत आन पड़ी,
कहां हो श्री राम ?
आज छाए फिर मिरज़ाफर
दोस्त बने जयचंद ,
आस्तीन में सांप लोटते,
छल-कपट दु र्गंध,
कहां खो गए तरस गए हम,
अब तो आओ राम।
आस फिर से उसी ज्वाला की
जो थी दिल में सुभाष बोस की,
आज दिल दहके, मन तड़पे
भूले आजाद, भगत , खुदीराम
देर ना करो ,दर्शन दे दो
सद् बुद्धि दो, ओह मेरे राम।।
नागपुर (महाराष्ट्र)

