व्यंग्य के दायरे में अशिष्ट व फूहड़ हास्य की कोई जगह नहीं : डॉ. सूर्यबाला
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नागपुर। व्यंग्यधारा द्वारा गत रविवार को आयोजित ऑनलाइन 41वीं व्यंग्य विमर्श गोष्ठी में 'व्यंग्य और व्यंग्यकार का दायरा और दायित्व' विषय पर कहानी व व्यंग्य में बड़ी बेबाकी से कलम चलाने वाली प्रख्यात व्यंग्यकार डॉ सूर्यबाला लाल ने अपनी बात को विस्तार देते हुए कहा कि व्यंग्य सकारात्मक होना चाहिए, प्रहारात्मक नहीं। व्यंग्य में महिला - पुरुष विभाजन के मुद्दे पर उनका कहना है कि व्यंग्य एक कलात्मक विधा है और व्यंग्य अथवा किसी भी विधा में पुरुष और महिला का भेद नहीं होना चाहिए।
कुछ लोग हैं जो व्यंग्य को आसान समझते हैं, लेकिन व्यंग्य लिखना आसान काम नहीं है। व्यंग्य और व्यंग्यकार का दायरा के सवाल पर उन्होंने कहा कि व्यंग्य का कोई दायरा नहीं है, लेखक का दायरा हो सकता है, लेकिन व्यंग्य का नहीं। रही दायित्व की बात तो पहला दायित्व यह है कि आप अपने आप को समझ ले कि आप व्यंग्यकार हैं या नहीं | व्यंग्यकार की तासीर या कहें कि मिजाज अलग होता है|
यदि आप जीवन में व्यंग्यकार नहीं हैं, आपमें वह कूबत नहीं है तो आप व्यंग्य नहीं लिख सकते हैं। व्यंग्य में इतनी ताकत होती है कि वह मिट्टी के ढेले को भी हथगोला बना सकता है। उन्होंने आगे बताया कि व्यंग्य स्थूल नहीं बारीक होना चाहिए। उनके अनुसार समीक्षक को फुसलाया जा सकता है परंतु पाठक को नहीं। व्यंग्य में हास्य को लेकर उन्होंने कहा कि हास्य व्यंग्य को पठनीय व कलात्मक बनाता है और उसकी नक्काशी भी करता है। उनका मानना है कि शिष्ट हास्य सदा रचना को पठनीय बनाता है। मैं अशिष्ट फूहड़ और अश्लील हास्य को बरदाश्त नहीं कर सकती हूँ.
उन्होंने यह जोर देकर कहा कि व्यंग्य की चाल तिर्यक होती है, सीधी नहीं। हमें यह समझने और सदा याद रखने की जरुरत है| विमर्श की इस गोष्ठी में हँसिकाएं लिखकर विश्व प्रसिद्ध होने वाली प्रमुख वक्ता डॉक्टर सरोजिनी प्रीतम जिनकी 50 से अधिक पुस्तकें आ चुकी है, ने विषय पर विस्तार से बात करते हुए कहा कि कविता एक मुसीबत है और मुसीबत जितनी छोटी हो उतना अच्छा है।
उनका मानना है कि व्यंग्य में शिष्ट और शालीन हास्य होना चाहिए। इस अवसर पर उन्होंने अपनी कुछ व्यंग्यात्मक कविताएं भी सुनाई। 'उन्हें खेद था कि जिसके तलवे उन्होंने चांटे थे उनके तलवे में छेद है'
"मंजे हुए खिलाड़ी जब हार कर लौटे तो हमने यही कहा कि हमने तो मंजे हुए भेजे थे फिर भी उन्होंने धो दिया"
'कन्या के पिता की इच्छा गऊ सी कन्या को मिले कोल्हू बैल'
अपनी व्यंग्य यात्रा के बारे में उन्होंने बताया इस यात्रा में कांटे तो बहुत हैं, परंतु यह अच्छा है कि मुझे जूते नहीं मिले। लेखन में सिर्फ एक आध छोटे - मोटे भेद के द्वारा भी कैसे रचना में हास्य-व्यंग्य का समावेश किया जा सकता है यह उन्होंने अपनी कुछ रचनाओं को पढ़कर बताने की कोशिश की। सिर पीट लिया उन्होंने हड़ताल का समाचार पढ़कर। लिखा था, आशिक हड़ताल पर, शायद आंशिक हड़ताल की सूचना थी।
डॉ सूर्यबाला लाल और डॉ सरोजिनी प्रीतम ने गोष्ठी के दूसरे सत्र में देशभर के व्यंग्यकारों के सवालों पर उनकी शंकाओं का समाधान किया और बड़ी बेबाकी से अपनी बात रखी। आयोजन के आरम्भ मे व्यंग्यकार रमेश सैनी ने संचालन करते हुए व्यंग्यधारा की गतिविधियों और उद्देश्य को बताते हुए व्यंग्य विमर्श के विषय पर प्रकाश डाला| आज के परिदृश्य को केंद्र में रखते हुए व्यंग्य और व्यंग्यकार में व्याप्त विसंगतियों को संकेतों में स्पष्ट करते हुए विषय की आवश्यकता और महत्व पर जोर दिया.
विमर्श के संयोजक और व्यंग्य आलोचक डाँ. रमेश तिवारी ने समूह की तकनीकी पक्ष का गंभीरता से निर्वाह किया. व्यंग्यकार उपन्यासकार और सम्पादक मधु आचार्य आशावादी ने आज के विमर्श के महत्वपूर्ण पक्ष पर अपनी टिप्पणियों के साथ अतिथि वक्तागण और सभी सहभागी सदस्यों का आभार व्यक्त किया.
व्यंग्यधारा की इकतालीसवीं ऑनलाइन वीडियो व्यंग्य विमर्श गोष्ठी में सम्मानित व्यंग्यकार सर्वश्री मधु आचार्य 'आशा वादी, अनूप शुक्ल, बुलाकी शर्मा, सुनील जैन राही, शांति लाल जैन, अरुण अर्णव खरे, सौरभ तिवारी, कुंदन सिंह परिहार, शशिकांत सिंह 'शशि', मोहन चंद्र वर्मा, अर्चना सांवरिया, रक्षा पुरी, इंद्रजीत कौर, राजशेखर चौबे, सुधीर कुमार चौधरी,दिलीप तेतरबे, कुमार सुरेश, ओम वर्मा, हनुमान मुक्त, हनुमान प्रसाद मिश्र, श्रीमती वीना सिंह, प्रभाशंकर उपाध्याय, अल्का अग्रवाल सिग्तिया, रेणु देवपूरा, राकेश सोहम, एम एम चंद्रा, विवेकरंजन श्रीवास्तव, जयप्रकाश पाण्डेय, अभिजित कुमार दूबे, वीरेन्द्र सरल, टीकाराम साहू आजाद आदि सदस्यों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।
