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साहित्य का आधार है समाज : प्रो. अमरनाथ


नागपुर। दुनिया के किसी भी भाषा और साहित्य का आधार वहां का समाज होता है। समाज की ही चित्तवृत्तियों का साहित्य में अंकन होता है। जिस समय का जैसा समाज रहता है, उस समय का साहित्य भी वैसा ही रचा जाता है। हिन्दी भाषा और साहित्य का आधुनिक काल भारतीय नवजागरण की आकांक्षा का काल है। यह बात कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर, वरिष्ठ आलोचक प्रो. अमरनाथ ने हिन्दी विभाग, राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित विशिष्ट व्याख्यान में कही।

उन्होंने कहा कि आधुनिक काल हमारे राष्ट्रीय चेतना का ही समय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक उन्नयन का भी समय है। भारतेन्दु के समय से ही जो तार्किकता, वैचारिक वस्तुनिष्ठता विशेषकर हिन्दी समाज में आई , उससे साहित्य को नया कलेवर मिला। इस दौर के साहित्यकारों ने अपने समय की आहटों को गहराई से महसूस किया। 

उन्होंने कहा कि यह जरूर चिंता और अन्वेषण का विषय है कि समूचे आधुनिक समाज ही नहीं, साहित्य पर भी जिस महामानव का वैचारिक रुप से सबसे गहरा प्रभाव पड़ा, हिन्दी में उस पर खूब लिखा भी गया, किन्तु दुर्भाग्य से उसे हमारी साहित्यिक चेतना का परिवर्तनकारी बिन्दु नहीं माना गया और न ही हमारी विवेचक-बुद्धि गांधी दर्शन को आधार बनाकर साहित्यिक प्रवृत्तियों का निर्वचन कर सकी। 

प्रो अमरनाथ ने इस बात पर बल दिया कि आधुनिक साहित्य की व्यापक और व्यवस्थित समझ तभी विकसित हो सकती है जबकि हिन्दी की सभी बोलियों, रुपों के साथ उर्दू के साहित्य को अपने अध्ययन के दायरे में लाया जाय पर।

स्वागत उद्बोधन देते हुए विभागाध्यक्ष डॉ मनोज पाण्डेय ने कहा कि आधुनिक साहित्य के इतिहास की समस्याओं पर आज विचार करने की आवश्यकता है। आधुनिक काल की प्रवृत्तियों और उनके निर्धारक तत्वों पर जब तक विचार नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसे कई पक्ष ओझल रहेंगे जिनके साहित्यिक - सामाजिक प्रदेय से समाज वंचित रहेगा। सामाजिक विमर्शों के परिप्रेक्ष्य में साहित्यिक चेतना, प्रवृत्तियों का मूल्यांकन जरूरी है।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. सुमित सिंह ने किया तथा आभार प्रदर्शन डॉ. संतोष गिरहे ने व्यक्त किया। इस अवसर पर हिन्दी विभाग एवं अन्य महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों के अनेक विद्यार्थी, शोधार्थी  एवं साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।

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