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सोशल मीडिया कहता है अंग्रेजी में हिंदी लिखो, इस षडयन्त्र से बचे : डॉ. जोगेंद्र सिंह बिसेन


नागपुर/पुणे। वैश्वीकरण के इस नूतन दौर में सोशल मीडिया कहता है कि अंग्रेजी में हिंदी लिखो, इसके पीछे बहुत बड़ा षडयंत्र है, जिससे हमे बचे रहना चाहिए। ये प्रतिपादन स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाडा विश्वविद्यालय, नांदेड के समकुलपति डॉ. जोगेंद्र सिंह बिसेन ने किया। 

शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर से संलग्न सेनापति प्रतापराव गुजर शिक्षण संस्था, कानडेवाडी संचलित राजा शिवछत्रपति कला व वाणिज्य महाविद्यालय, महागांव, कोल्हापुर तथा रूसी भारतीय मैत्री संघ 'दिशा' मास्को, रूस के संयुक्त तत्वावधान में ‘हिंदी के अध्येताओं को रोजगार के अवसर' विषय पर आयोजित एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय आभासी गोष्ठी में वे उद्घाटक के रूप में अपना उद्बोधन दे रहे थे। 

श्री बाळासाहेब कुपेकर, अध्यक्ष, सेनापति प्रतापराव गुजर शिक्षण संस्था, कानडेवाडी ने अध्यक्षता की। प्रो. डॉ. बिसेन ने आगे कहा कि भारत देश की विभिन्नताओं के मध्य एक हिंदी भाषा सभी को जोड़ती है। भारत वर्ष ही संसार में सिरमौर है, और हमारी एकता के सूत्र में जोड़ने वाले कई धागे हैं। हमें अंग्रेजीयत से बचना चाहिए। हमारे यहाँ रोजगार के अनेक क्षेत्र हैं। हिंदी के रोमनीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति को रोकते हुए राष्ट्र लिपि देवनागरी की सुरक्षा के साथ भारतीय संस्कृति के अस्तित्व को अबाधित रखना चाहिए।  

डॉ. निवास जाधव, प्राचार्य, राजा शिवछत्रपति महाविद्यालय, महागांव ने स्वागत भाषण में गोष्ठी के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। सेनापति प्रतापराव गुजर शिक्षण संस्था, कानडेवाडी के अध्यक्ष श्री बाळासाहेब कुपेकर ने अध्यक्षीय मन्तव्य में कहा कि हिंदी विश्वमंच पर छा गई है, अतः रोजगार के अनेक अवसर उपलब्ध हैं। पाकिस्तान में हिंदी बोली जा रही है और हम भारतीय अंग्रेजी के दुष्प्रभाव से हिंदी के प्रति उदासीन है।

शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अर्जुन चव्हाण ने अपने बीज  भाषण में कहा कि समय के साथ शिक्षा पद्धति बदल गई है। प्राचीन शिक्षा पद्धति में धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की महत्ता थी। आज इनमें से तीन अलग होकर केवल 'अर्थ' बच गया है। जिसका संबंध शिक्षा क्षेत्र से जोड़ा गया है। विश्व में कोई भी विश्वविद्यालय उपाधि देने की गारंटी देता है, परंतु नौकरी देने की नहीं। अध्येता और अध्यापक यदि अपना दायित्व, क्षमता व प्रासंगिकता को समझे तो रोजगार की कोई कमी नहीं है।

क्वाँगतोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय, गवानजही, चीन के पूर्व आचार्य डॉ. गंगा प्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ ने कहा कि हिंदी को अपनी संस्कृति व सभ्यता से जोड़ना होगा। एक से अधिक भाषा सीखने वालों को एक से अधिक रोजगार उपलब्ध है। चीन में योग सीखाकर भी रोजी कमाई जा रही है। केंद्रीय विश्वविद्यालय, भारतीय दूतावास, मास्को, रूस के प्रो. डॉ. सुशील कुमार आजाद ने कहा कि, भाषा का अध्ययन एक कला है। जब तक हिंदी के प्रति गर्व महसूस नहीं करेंगे, तब तक हमारा बेडा पार नहीं होगा। रूसी भारतीय मैत्री संघ 'दिशा' मास्को, रूस के अध्यक्ष डॉ. रामेश्वर सिंह ने कहा कि अध्यापक छात्रों को अवश्य बताए कि रोजगार कहाँ-कहाँ उपलब्ध है।

श्री जयवर्धनपुर विश्वविद्यालय,  नूनेगोड़, श्रीलंका के भाषा सांस्कृतिक अध्ययन और रंग कला तथा हिंदी विभाग की प्रो. डॉ. नीलांती राजपक्ष ने उद्बोधन में कहा कि पूरे विश्व में हिंदी का प्रचार-प्रसार हो रहा है। श्रीलंका में हिंदी गीत की धुन पर सिंहली में गीत बनते हैं। श्रीलंका में हिंदी लोकप्रिय है तथा यहाँ निजी कंपनियों में नौकरियां मिलती है। हिंदी कवयित्री  तथा रवींद्र भारती विश्वविद्यालय, कोलकाता की प्रो. डॉ. विजेता साव ने कहा कि बेरोजगारी से जूझती दुनिया में रोजगार दिलाने में हिंदी सक्षम व समर्थ है। सवेतन या नौकरी, स्वरोजगार तथा व्यापार इन तीन माध्यमों से रोजी का प्रश्न हल हो सकता है।

विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष तथा महाराष्ट्र के लोकसेवा महाविद्यालय, औरंगाबाद के पूर्व प्राचार्य डॉ. शहाबुद्दीन नियाज मुहम्मद शेख ने कहा कि रोजगार की समस्या मनुष्य के सामने निरंतर रही है। वर्तमान में हिंदी में रोजगार के अवसर हर क्षेत्र में उपलब्ध है। सरकारी क्षेत्र सहित निजी क्षेत्रों में बाजार, संचार, मनोरंजन, पत्रकारिता, मीडिया, पर्यटन, अनुवाद, विज्ञापन आदि क्षेत्रों में रोजगार के अवसर अत्यधिक मात्रा में हैं। 

डॉ. बी. डी. जत्ती शिक्षा महाविद्यालय, बेळगांव, कर्नाटक के प्राचार्य डॉ. हिंदुराव घरपणकर ने कहा कि हिंदी विश्व पटल पर निरंतर विस्तारित हो रही है। रोजगार की समस्या हल करने में हिंदी आज सक्षम है।

डॉ. संजीवनी पाटील, गडहिंग्लज, कोल्हापुर ने अतिथि परिचय प्रस्तुत किया। प्रो. एन बी. एकिले, गडहिंग्लज ने गोष्ठी का संचालन किया तथा गोष्ठी की समन्वयक व राजा शिवछत्रपति महाविद्यालय, महागांव की हिंदी विभागाध्यक्षा डॉ. सुगंधा घरपणकर ने धन्यवाद ज्ञापन किया। तकनीकी सहायता डॉ. संदीप इंगळे, युनूस हावळे तथा रिजवान हावळे ने प्रदान की। कार्यालय अधीक्षक श्री बी. ए. पाटील ने गोष्ठी के संयोजन में अपूर्व सहयोग दिया। भारत, चीन, श्रीलंका, आदि देशों के 650 प्रतिभागियों ने गूगल मीट तथा यूट्यूब पटल पर जोडकर अपनी सहभागिता दर्शायी।
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