कबीर एक कालजयी संत कवि है : डाॅ.शहाबुद्दीन शेख
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यह प्रतिपादन विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज उ.प्र.के अध्यक्ष प्राचार्य डाॅ. शहाबुद्दीन नियाज मुहम्मद शेख,पुणे, महाराष्ट्र ने किया।
विश्वहिंदी साहित्यसेवा संस्थान,प्रयागराज की 63 वीं आभासी गोष्ठी में वे अध्यक्षीय उद्बोधन दे रहे थे।
"भक्तिकाव्य: ज्ञानाश्रयी संत काव्य धारा (कबीर)"इस विषय पर गोष्ठी आयोजित थी।
डाॅ. शहाबुद्दीन शेख ने आगे कहा कि,कबीर की वाणी में मानवता के लिए अमर संदेश पाया जाता है।कबीर ने एक साथ 'इहलोक और परलोक' को साधा है।
कबीर ने समाज में प्रचलित अंधविश्वासों,कुरीतियों तथा सामाजिक रुढियों पर कठोर प्रहार किया है।कबीर जितने क्रांतिकारी है, उतने ही प्रेमी। वे निरक्षर होते हुए भी बहुश्रुत अवश्य थे।
उनका काव्य रहस्यवाद के लिए विख्यात है। कबीर व्यष्टिवादी नहीं,समष्टिवादी थे। उनकी दृष्टि समष्टिपरक थी।वे निर्भीक थे।
विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान,प्रयाग राज के सचिव डॉ.गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी ने अपने मंतव्य में कहा कि हिंदी साहित्य के हजार वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेखक या कवि निर्माण नहीं हुआI कबीर की वाणी में तत्कालीन मानवीय संवेदना बडी व्यापकता और समग्रतासे ध्वनित है I
डाॅ.सुधा सिन्हा, पटना ने कहा कि कबीर पूर्णत: मानवतावादी तथा क्रांतिकारी के रूप में जाने जाते हैं। कबीर निरक्षर थे, पर आध्यात्मिक संत थे।उन्होंने ब्रह्म को निर्गुण माना है।
डाॅ. निधि जैन, इंदौर ने कहा कि कबीर काव्य में छंद,अलंकार आदि की कमी है, 'परंतु उन्होंने समाज प्रचलित धार्मिकता,अंधश्रद्धा तथा अमानवीयता पर प्रहार किया है। कबीर अनुभवों को कागज पर उतारते थे। उनकी वाणी धारदार थी।
प्रो. डाॅ. अनुसूया अग्रवाल, महासमुंद छ.ग. ने कहा कि कबीर का काव्य कोहिनूर है। उनका काव्य हमें मनुष्य बनने के लिए प्रेरित करता है।प्रेम के माध्यम से परमात्मा को पाने की बात उन्होंने कही है।
डाॅ.रश्मि चौबे,गाजियाबाद ने कहा कि कबीर के पास क्रांति दृष्टि के साथ अंतरदृष्टि भी थी।उनकी भाषा सधुक्कडी थी।
श्री ओमप्रकाश त्रिपाठी, अति विशिष्ट वक्ता ने कहा कि लोककल्याण व लोकमंगल की भावना संत काव्य में पायी जाती है।संतकाव्य में आध्यात्मिक विचारों की सुंदर अभिव्यक्ति हुई है।कबीर निर्गुण राम के उपासक थे। कबीर ने मानवता धर्म को प्रतिष्ठित किया है।
डाॅ.रत्ना सिंह,नोएडा ने कहा कि कबीर ने हमेशा अहंकार का विरोध किया है।श्रीमती रश्मि संजय श्रीवास्तव ने कहा कि कबीर रागदरबारी कवि नहीं थे, वे जनता के कवि थे।परमसत्ता के सामने कोई छोटा-बडा नहीं है। कबीर ने जातिवाद का घोर विरोध किया है।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि डाॅ.उषा किरण,पटना तथा डाॅ.राधा वाल्मिकी ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
गोष्ठी का शुभारंभ श्रीमती नुपूर मालवीय,प्रयागराज की सरस्वती वंदना से हुआ।डाॅ. प्रभांषु कुमार, प्रयागराज ने स्वागत उद्बोधन दिया तथा डाॅ.सीमा वर्मा,लखनऊ ने प्रास्तविक मंतव्य दिया।गोष्ठी का सफल व सुंदर संचालन डाॅ. मधु शंखधर 'स्वतंत्र' प्रयागराज ने किया तथा श्रीमती पुष्पा श्रीवास्तव 'शैली' ने आभार व्यक्त किए।