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गोस्वामी संत तुलसीदास का पुण्य सिमरण


जयंती पर किया नमन

नागपुर। श्री बिंज़ाणी नगर कॉलेज, तायवाडे कॉलेज एवं वी.एम.वी महाविद्याल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हिंदी के महान कवि "गोस्वामी संत तुलसीदास जयंती समारोह” का आयोजन आभासी मंच पर किया गया। गृह अर्थशास्त्र की विभागाध्यक्ष डॉ. साधना कर्हाडे के मधुर स्वरों से सरस्वती वंदना एवं संत तुलसीदास के दोहों का गान हुआ। अंग्रेज़ी के प्राध्यापक निखिल जोशी द्वारा संत तुलसीदास के पदों की भजन रूप में सरस प्रस्तुति की गई। समारोह का प्रास्ताविक वक्तव्य वी.एम.वी.हिंदी स्नातकोत्तर विभाग की अध्यक्ष डॉ. सोनू जेसवानी ने दिया। 


तायवाड़े महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. शरयू तायवाडे ने स्वागत्परक वक्तव्य देते हुए इस समन्वित आयोजन की प्रशंसा की। बिंझानी सिटी कॉलेज के प्राचार्य डॉ. सुजीत मेत्रे सर ने प्रसंग विशेष उद्बोधन में कहा, "इतिहास का अवगाहन करें तो हम पाएंगे कि गौतम बुद्ध के बाद तुलसीदास ही ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखलाई देते हैं, जिन्होंने मानवतावाद को बहुत ही व्यापक परिधि में प्रतिष्ठित किया।" वक्ता त्रयी में से प्रथम रा.तु.म. नागपुर विश्वविद्यालय की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. वीणा दाढ़े ने 'तुलसीदास के कृतित्व की विशेषताएं’ विषय अपने मंतव्य को रेखांकित किया -"तुलसी काव्य में निहित सार्वभौमिक जीवन मूल्यो का चित्रण, विश्व मानव को उनकी विलक्षण देन है। अवधी जैसी जनभाषा के माध्यम से उदात्त जीवन मूल्यों को प्रसारित करने का अविस्मरणीय प्रयास उन्होंने किया। उनकी रचनाएं शांति और सद्भाव का बोध कराती हैं। वे सही अर्थों में महामानव थे।" 

पूर्व मेयर एवं शिक्षण मंच की अध्यक्ष डॉ. कल्पना पांडे मैडम ने अपने प्रमुख वक्तव्य में 'रामचरितमानस संभाषण कौशल का अक्षय कोष" विषय पर अपने व्यख्यान में कहा- "बाल कांड, किष्किंधा कांड, अरण्य कांड, सुंदर कांड आदि-आदि में  संभाषण कौशल के अनेकों अनूठे उदाहरण हैं। हनुमान जी के सुरसा, विभीषण, रावण, राम, सीता आदि से किये गए वार्तालाप में बिना उत्तेजित हुए भी सतर्क,सजग करने और चेताने का कौशल उल्लेखनीय है। रामचरितमानस व्यावहारिक ज्ञान का प्रशिक्षण क्षेत्र है।" 

पूना के वरिष्ठ साहित्यकार एवं आकाशवाणी केंद्र के पूर्व सहायक निदेशक डॉ. सुनील देवधर ने "तुलसी के राम" विषय पर मनोभिव्यक्ति की- "वैश्विक स्तर पर देखें तो शेक्सपियर के पश्चात यदि किसी साहित्यकार पर बड़ी मात्रा में शोध - कार्य हुआ है, तो वे तुलसीदास हैं। तुलसी के राम न कोरे काल्पनिक पुरुष हैं, न लिखवाए गए ऐतिहासिक पुरुष हैं , बल्कि वे पुरातत्वों द्वारा प्रमाणित एक सच्चे लोकतांत्रिक पुरुष हैं।" 

संत गाडगेबाबा अमरावती विश्वविद्यालय के पूर्व कुलगुरु एवं वी. एम.वी. के प्राचार्य डॉ. मुरलीधर चांदेकर ने अध्यक्षीय उद्बोधन में तुलसीदास के प्रदेय की प्रशंसा करते हुए कहा - "लगभग पांच हज़ार वर्ष पूर्व की भारतीय परंपरा को पन्द्रहवीं शताब्दी में पुनर्जीवित कर उसे अजर-अमर बनानेवाले तुलसीदास की कलम निश्चित रूप से वंदनीय है।" धन्यवाद ज्ञापन तायवाडे कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष  डॉ. गजानन पोलेनवार ने किया। समारोह का सुचारू सूत्र - संचालन समन्वयक डॉ. सुधा जांगिड़ ने किया। अतिथियों का परिचय डॉ. प्रियंका पंडित, डॉ. राहुल वाघमारे तथा प्रा. दिलीप गिरहे ने दिया। तकनीकी व्यवस्था को कम्प्यूटर विभाग प्रमुख प्रा. पारस वाढेर, प्रा. मेहुल घिया एवं प्रा. खुशबू वर्मा ने संभालते हुए इस आभासी मंच के समारोह को सफल बनाया।

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