आमजन की पीड़ा की अभिव्यक्ति और बदलाव के व्यंग्यकार हैं परसाई : सेवाराम त्रिपाठी
व्यंग्यधारा की 68वीं व्यंग्य विमर्श गोष्ठी ‘परसाई : पाठ-पुनर्पाठ' का ऑनलाइन आयोजन
नागपुर। व्यंग्य के पुरोधा हरिशंकर परसाई आमजन की पीड़ा की अभिव्यक्ति और बदलाव के व्यंग्यकार हैं। यह बात परसाई जी का सान्निध्य प्राप्त वरिष्ठ व्यंग्यकार सेवाराम त्रिपाठी (रीवा) ने परसाई जी की जयंती के सुअवसर पर उनको स्मरण करते हुए कही। परसाई जी की रचनात्मकता को केंद्र में रखते हुए व्यंग्यधारा की 68वीं व्यंग्य विमर्श गोष्ठी ‘परसाई : पाठ-पुनर्पाठ' का ऑनलाइन आयोजन किया गया।
इस आयोजन में डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि हरिशंकर परसाई जी की रचनाओं में विचार, जीवन का संघर्ष और आम आदमी की पीड़ा है। उनके व्यंग्यों में भारतीय जीवन और समाज में बदलाव की आकांक्षा दिखाई देती है। उनकी रचनाएं आम आदमी की प्रतिबद्धता संबद्धता का घोषणापत्र है। परसाई जी ने पुरस्कार और पद के लिए नहीं, बल्कि जीवन और समाज को बदलने के लिए लिखा। उन्होंने हिंदुस्तान की जिंदगी और विडंबनाओं से मुठभेड़ की। उनकी प्रासंगिकता और पाठ भी है और लेखकों के लिए चेतावनी भी है।
डा. त्रिपाठी ने कहा कि परसाई जी अपने समय को लेकर बहुत सावधान थे। प्रलेस में काम किया। सन 1970 से लंबा रिश्ता रहा। उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक विडंबनाओं, धार्मिक पाखंड सहित ऐसा कोई विषय नहीं रहा, जिस पर उन्होंने कलम न चलाई हो। आजादी के बाद जो घटता रहा, उसे अपना विषयवस्तु बनाया।
इसके पूर्व वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री रमेश सैनी (जबलपुर) ने गोष्ठी की भूमिका रखते हुए कहा कि परसाई जी को याद करते हुए हम उनके मनुष्यता के पक्ष में लेखन को याद करते हैं। अपने पुरखे को याद करना है। यह बड़ी विडंबना है कि हमारे समय के लेखकों के पास अपनी रचनाओं को पढ़ने का समय नहीं है। परसाई जी अपनी अनेक रचनाओं में उपस्थित नजर आते हैं।
तत्पश्चात गोष्ठी की शुरुआत करते हुए लखनऊ से मुख्य वक्ता वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री राजेंद्र वर्मा ने कहा कि व्यंग्य की भाषा, विषय वस्तु क्या है, महत्व क्या है, यह जानने के लिए पुनर्पाठ का आयोजन किया गया। परसाई जी की रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं। जो समय उनके लेखन के समय था, वह आज भी है। मूल्यहीनता, सामाजिक और धार्मिक पाखंड, राजनीतिक छल आज और बढ़ गए हैं। आम आदमी का जीवन दुश्वार हो गया है। अकाल उत्सव, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, टार्च बेचने वाले, सुदामा के चावल, हम बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं आदि परसाई जी के सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य हैं। उनकी रचना से जीवन की व्याख्या, विश्लेषण और विसंगतियों पर प्रहार करने का साहस मिलता है।
व्यंग्य विमर्श में जबलपुर से मुख्य वक्ता श्री कुंदन सिंह परिहार ने कहा कि परसाई की रचनाओं पर नए ढंग और कोणों से विचार करने की जरूरत है कि उनकी कौन सी चीज बार-बार अपील करती है। परसाई केवल लेखक नहीं थे, समाज को बदलने की बेचैनी उनमें थी जैसे कबीर। भारतेंदु हरिश्चंद्र भी इसी श्रेणी के है। परसाई ने कहा था-वास्तव में मैं बहुत दुखी हूं। मनुष्य का क्या हाल है। हमारा काम परिवर्तन की चेतना बनाना है। परसाई जी केवल लेखन तक सीमित नहीं थे, जबलपुर में दंगे होने पर अखबारों के दफ्तर में जाकर संतुलित समाचार के लिए प्रयास किया। परसाई जी कभी दीन नहीं बने, हमेशा आत्मसम्मान की बात की। वे आलोचना को सुस्त और निंदा को कैंसर मानते थे।
प्रखर व्यंग्य आलोचक डॉ. रमेश तिवारी (नई दिल्ली) ने परसाई जी को व्यंग्य की पाठशाला निरूपित करते हुए कहा कि व्यंग्य लेखन को ठीक से समझने, व्यंग्य की जमीन और व्यंग्य की भाषा कैसी हो, यह जानने के लिए परसाई सबसे बड़ी पाठशाला हैं। परसाई जी का लेखन हमें यह सिखाता है कि जीवन और लेखन को कितने करीब रखना है। बेहतर लेखन बदलाव के वक्त मार्गदर्शक साबित होते हैं। हिंदी व्यंग्य की समझ को समृद्ध करने के लिए परसाई को पढ़ना, बार-बार पढ़ना जरूरी है ।
वरिष्ठ व्यंग्यकार दिलीप तेतरवे (रांची) ने कहा कि सांप्रदायिकता तब भी थी और आज भी है। वह नष्ट नहीं होती। सत्य और सुंदर ताकतों को दबाकर रखना चाहती है। इसी बात को कबीर और परसाई ने रखा। परसाई की दृष्टि और दृष्टिकोण को अपनाकर समाज देश और लोकतंत्र की रक्षा कर सकते हैं। वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री अनूप शुक्ला (शाहजहांपुर) ने कहा कि परसाई जी ने अपने स्तंभ ‘पूछिए परसाई से’ के जरिए लोगों को शिक्षित करने का काम किया
प्रस्तावना व कार्यक्रम का संचालन श्री रमेश सैनी ने किया। आभार प्रदर्शन करते हुए श्री अभिजीत कुमार दुबे (अगरतला) ने कहा कि इस तरह के व्यंग्य विमर्श से परसाई जी को नए ढंग से समझने में मदद मिलती है। आयोजन का तकनीकी मार्गदर्शन श्री अरुण अर्णव खरे (बंगलुरु) का रहा। गोष्ठी में व्यंग्यकार संतोष खरे (सतना), मधु आचार्य ‘आशावादी'(बीकानेर), बुलाकी शर्मा (बीकानेर), सुधीर कुमार चौधरी (इंदौर), कुमार सुरेश (भोपाल), सुनील जैन राही (दिल्ली), वीना सिंह (लखनऊ), रेणु देवपुरा (उदयपुर), डा. महेंद्र कुमार ठाकुर (रायपुर), किशोर अग्रवाल (रायपुर), सुरेश कुमार मिश्र ‘उरतृप्त' (हैदराबाद), टीकाराम साहू ‘आजाद' (नागपुर), हनुमान प्रसाद मिश्र (अयोध्या), विवेक रंजन श्रीवास्तव (जबलपुर), जय प्रकाश पाण्डेय (जबलपुर), राकेश सोहम (जबलपुर), नवीन जैन, सौरभ तिवारी (नई दिल्ली), सूर्यदीप कुशवाहा आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।
