शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में संप्रेषण कौशल का विशेष महत्व : डॉ. मुक्ता कौशिक
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नागपुर/पुणे। शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में संप्रेषण कौशल से तात्पर्य है, दो या दो से अधिक के मध्य होने वाली वार्ता को संप्रेषण कहते हैं, जिसमें कोई एक व्यक्ति अपने विचारों को, अपने अनुभवों को या किसी सूचना को अपने सामने वाले व्यक्ति या समूह को देता है। अतः शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में संप्रेषण कौशल का निसंदेह विशेष महत्व है। इस आशय का प्रतिपादन ग्रेसियस कॉलेज ऑफ एजुकेशन, रायपुर, छत्तीसगढ़ की सहायक प्राध्यापिका डॉ. मुक्ता कान्हा कौशिक ने किया।
रॉयल कॉलेज लालबाग, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संकाय विकास कार्यक्रम में वे विषय विशेषज्ञ के रूप में अपना उद्बोधन दे रही थी। डॉ. मुक्ता कौशिक ने आगे कहा कि संप्रेषण लिखकर, बोलकर, तथा संकेतों द्वारा किया जा सकता है। इसी योग्यता को संचार कौशल कहा जाता है।
संप्रेषण कौशल को विकसित करना कोई एक-दो दिन का काम कदापि नहीं है। संप्रेषण कौशल में सुधार लाने के लिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। संप्रेषण कौशल का जितना उपयोग करेंगे, उसके लिए जितना समय देंगे तथा इसमें जितना अभ्यास होगा उतना ही यह उपक्रम उतना ही अधिक प्रभावी सिद्ध होगा। प्रभावी संप्रेषण के लिए यह आवश्यक है कि बात करते समय चेहरे पर प्रसन्नता हो और जिससे आप बात कर रहे हैं, उससे आपका नेत्र संपर्क बना रहे।
शिक्षण में बहुत सी समस्याओं का समाधान अध्यापक द्वारा ध्यानपूर्वक श्रवण कौशल का विकास करने से होता है। श्रवण कौशल को विकसित करने के लिए अध्यापक को चार चरणों से गुजरना पड़ता है - रुको, देखो, सुनो व अनुक्रिया करो। अध्यापक को अच्छे वक्ता के साथ अच्छा श्रोता भी होना चाहिए। तभी वह छात्रों में भी श्रवण कौशल का विकास कर सकता है। प्रभावशाली प्रस्तुति के लिए आवश्यक है कि सम्प्रेषक अपने द्वारा दिए जाने वाले वक्तव्य को समय के अनुसार व्यवस्थित एवं विषय वस्तु को क्रमबद्ब कर ले। अध्यापक की भूमिका प्रभावी होनी चाहिए, जो श्रोताओं का ध्यान केंद्रित करके उसें जिज्ञासू बना सके। संबंधित संदर्भो, विद्वानों द्वारा कहे गए कथनों, लोकोक्तियों, मुहावरों, व्याख्याओं का प्रयोग आदि प्रस्तुतीकरण को प्रभावी बनाता है। समापन में मुख्य बिंदुओं का संक्षिप्तीकरण प्रस्तुत करते हुए वक्तव्य को समाप्त करना चाहिए।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. अरुणा पलटा, कुलपति हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग, छत्तीसगढ़ थी। संस्थापक डॉ. जे.बी. सिंह, निदेशक श्री संजय बी. सिंह, सावंत बी. सिंह, प्राचार्य डॉ. अनुराधा शुक्ला तथा एल.के. वैष्णव के अतिरिक्त छत्तीसगढ़ के कतिपय महाविद्यालयों के प्रोफेसरों, सहायक अध्यापकों, छात्रों एवं अन्य महानुभावों की विशेष उपस्थिति रही।
