मन बावरा...
https://www.zeromilepress.com/2021/10/blog-post_12.html
इन रस्तों से गुज़रे
कुछ ऐसे
साधु फकीर,
कुछ मोह में उलझ गए
तो कुछ ने खींची लकीर।
पागल मेरे मनवा बतियाए ऐसी बात,
सुन कर कई तर गए,
तो कुछ ने छोड़ा साथ।
गिरिधर गिरिधर
सब कहे
स्वांग रचे कविराय,
जब गिरिधर आए समुख
तो मुख विमुख होई जाए।
रे मन मेरा बावरा
उंची उड़न को चाहे,
नाही पंखो का संबल
झूठी चाह है काहे?
जिया भर भर जाए
सुन कर ऐसी बात
शिव ना कभी छोड़िए,
साधु संतो का साथ।
- डॉ. शिवनारायण आचार्य
नागपुर (महाराष्ट्र)