Loading...

बेटियां...


माया हास्पिटल का कमरा नं. 303, कुछ देर पूर्व यहां संपूर्ण शांति छाई हुई थी। अचानक उस कमरे से एक महिला के अत्यंत करुण क्रंदन की आवाज आने लगी। उसके रुदन में इतना दर्द था कि कदम खुद ब खुद उस कमरे की ओर मुड़ गये। वहां कुछ महिलाएं जमा थीं, जो बहुत आवेश में थीं। सभी  मिलकर पेशेंट महिला को ताने उल्हाने दे रहीं थीं और उसे उस अपराध के लिए दोषी ठहरा रहीं थीं जो उसने स्वेच्छा से नहीं किया था। 

उन महिलाओं की बातें सुन वह जोर जोर से रो रही थी पर शोर शराबे में मामला कुछ समझ नहीं आया। दूर दरवाजे पर खडी़ खडी़ मैं समस्या को समझने की कोशिश कर रही थी कि अचानक उस कमरे की भीड़ से एक नर्स आते हुए दिखी, उसने बताया, यहां भर्ति महिला ने दो जुड़वा बेटियों को जन्म दिया है। जबकि पहले से ही उनकी एक पांच वर्षीय बेटी है। अतः सब मिलकर उसे प्रताडित कर रही हैं, जिससे उसकी हालत बिगड़ती जा रही है।

नर्स तो बोलकर आगे बढ़ गई पर मेरे पैर वहीं जमीन पर गड़ गये। गहरा धक्का लगा। आज के आधुनिक तम युग में भी ये विचार ? एक ओर तो हम कन्याओं को पूजते हैं, उनका चरणामृत लेकर माथे से लगाते हैं, और दूसरी ओर कन्याओं के जनम पर मातम् ! ये दोहरे मापदंड क्यों ? ये पाखंड क्यों ?
वहीं कोने में खडी़ पांच वर्षीय बेटी बारी बारी से सबके चेहरे देख रही थी।

  
- प्रभा मेहता
नागपुर (महाराष्ट्र)

कथा 6701810626872205627
मुख्यपृष्ठ item

ADS

Popular Posts

Random Posts

3/random/post-list

Flickr Photo

3/Sports/post-list