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सर्वव्याप्त हैं शिवगौरी

हम धर्म साधक, अराधक व तपस्वी रह कर विश्व के कल्याण के अभिलाषी रहे हैं। विश्व को एक परिवार मानते है। विश्व के कल्याण में अपने मंगल की कामना करते हैं। इसीलिए हमारे के लिए पृथ्वी तो आराध्य है ही इसके आलावा यह अंतरिक्ष अौर अंतरिक्ष के पिण्ड भी आराध्य हैं।

  आदि मानव ने जब बाँस के घने जंगल को पतझड़ में सूखा व पत्तियों से अलग खड़ा पाया तो उसे अनोखा लगा। लेकिन जब अौर अनोखा लगा तब हवा चलने पर बाँस आपस में टकराये, अौर बाँसों  के बीच चिंगारी उत्पन्न हुई, वही चिंगारी नीचे पड़े सूखे पत्तों में लगी अौर देखते ही देखते जंगल भीषण अग्नि से जल उठा। तब आदि मानव के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उसके सामने ही उनके बच्चे, वृद्ध व कई जानवर अग्नि में जलकर स्वाहा हो गये। तब अग्नि में जले अन्न व मांस को खाया। स्वादिष्ट लगा तब से वह अग्नि की खोज में जुट गये। अौर पत्थर को पत्थर पर रगड़ कर अग्नि की खोज की। जिसकी ईश्वर रूप में आराधना करने लगे।

सच ही तो है ईश्वर दिखाई नही देता परंतु किसी न किसी रूप में वह है। वैसे ही जैसे आदिमानव को अग्नि दिखाई नही देती थी परंतु वह तो पृथ्वी पर थी। हवा उसे दिखाई नही देती थी लेकिन हवा पृथ्वी पर थी।  वह बरसते बादल के बाद पृथ्वी की हरियाली देख आश्चर्यचकित था अौर उसे ज्ञात हो चुका था जल के बिना वह जीवित नही रह सकता था अर्थात नदी का किनारा कैसे छोड़ सकता था। वह पृथ्वी पर ज्ञान पा गया था कि- जो जीवन देते हैं वह भगवान हैं।

आदिमानव पृथ्वी, अग्नि, हवा व जल को भगवान का रूप मानकर ईश्वर स्वरूप आराधना करने लगा अौर उसका जीवन परिवर्तित होने लगा। फिर भी उसके लिए मृत्यु एक रहस्य का विषय बना था जिससे आज तक विज्ञान नही समझ पाया। लेकिन मानव के लिए कुछ असंभव नही था। उसने करोड़ों वर्षों की मेहनत के पश्चात ये ज्ञान पा लिया था कि जेैसे अग्नि या हवा दिखाई नही देते हैं वैसे ही मानव के प्राण ईश्वर रूप में हैं जो दिखाई नही देते अौर एक समय देह त्याग कर आकाश में पिण्ड रूप में विचरण करते हैं। यह आदिमानव की साधना, आराधना व तप का परिणाम था कि उसने आकाश, अग्नि, पवन, जल व पृथ्वी जैसे पंच मूल्यवान तत्वों को खोजा था। जिसे पंचतत्व भी कहा जाता है।

अग्नि का विशाल स्वरूप सूर्य जो आकाश में विचरण करते हैं अौर उनका सूक्ष्म रूप चिंगारी पृथ्वी पर विचरण करती है। यही अनुभव मानव लगा सका कि - *"भगवान विशाल स्वरूप में आकाश में हैं तो सूक्ष्म स्वरूप में पृथ्वी के जीवों में।"*
परमात्मा का अंश आत्मा है जो प्रत्येक प्राणी में एकसमान है। बस प्रत्येक प्राणी दीये के सामान है जो बड़े दीये हैं उनमें ज्यादा तेल या घी है जो छोटे दीये हेै उनमें कम तेल या घी है। बड़े दीये ज्यादा देर तक अधिक प्रकाश देते हैं तो छोटे दीये कम देर तक कम प्रकाश देते हैं। परंतु दोनों का कार्य अंधकार मिटाने का है। दोनों ही पूज्य हैं। दोनों को हम नमन करते हैं।

शुभम्  करोति कल्याणं, आरोग्यं धन सम्पदा।
शत्रु-बुद्धि विनाशाय, दीप ज्योतिर्नमस्तुते। ।

अब, प्रश्न उठता है? हम पत्थरों या पत्थरों से बनी मूर्तियों को क्यों पूजने लगे। न इनमें प्राण है, न ही इनमें प्रकाश है। फिर क्या कारण है करोड़ों वर्षों से हम हिन्दू इन्हें देवी या देवता के रूप में   पूजते आ रहे हैं। जी हाँ, ज्यादा विचार मत कीजिए इसका कारण बड़ा सहज है। भगवान कृष्ण ने एक बार इंद्र का घमंड तोड़ने के लिए, गोवर्धन पर्वत की पूजा करने को कहा था। तब इंद्र देव ने रूष्ट होकर घनघोर वर्षा की। भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर पर्वत का महत्व बताया था। 

पर्वत जिस पर कठोर पत्थर होते हैं। वे कैसे कल कल्याण का कार्य कर रहे हैं। अपनी छाती पर बड़े-बडे वृक्षों को पाले हुए हैं, अनेकों जीव-जंतुओं को संरक्षण देते हेैं। प्राणवायु का निर्माण कर जीवों को जीवन देते हैं। ‍यही नही जब तेज वर्षा होती है तो ये घिस कर मिट्टी बनते हेैं। जिस मिट्टी में अनेकों प्रकार की फसलें व फल प्रत्येक प्राणी की भूख को शाँत करने में अपना अहम योगदान देते हैं। अब आप ही बताईये पत्थर पूजनीय है या नही?

यही कारण है कि जीवों का जो भी कल्याण कर रहा है वह ईश्वर रुप में पूजनीय है। हम वृक्षों की पूजा करते हैं, नदियों की पूजा करते हैं, हम शेर की पूजा करते हेैं, हम गाय की पूजा करते हैं, हम कौआ की पूजा करते हैं, हम चींटी तक की पूजा करते हैं, पृथ्वी पर जितने जीव-जंतु हैं सभी हमारे लिए पूजनीय है सभी पूजा करते हैं क्योंकि ये ही सृष्टि का कल्याण कर रहे हैं। हम पर्वतों या जंगलों को नष्ट कर दें तो क्या मानव जी सकेगा कदापि संभव नही है। यहाँ तक जीव का जन्म ही संभव नही हो सकेगा। कहने का तात्पर्य पृथ्वी का कण-कण पूजनीय है। पृथ्वी के कण-कण में ईश्वर रूप है। पृथ्वी पूजनीय है। पृथ्वी जन्म देने वाली माँ है।

यदि शिव नभ है तो गौरी धरा है। इसमें ममता है, इसमें करूणा है, इसमें दया है, इसमें  त्याग है, इसमें शीलता है, इसमें सहनशीलता है। इसलिए तो भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी की खाई थोड़ी-सी मिट्टी में, मुँह खोलकर , माँ यशोदा को तीनों लोक के दर्शन करा दिये थे।
भगवान श्रीराम जब वनवास जा रहे थे तो अपने साथ थोड़ी-सी मिट्टी भी लेकर गये थे अौर पूजा भी करते थे। भीष्म पितामह ने भी प्राण छोड़ने से पूर्व कन्हैया के हाथ का मिट्टी तिलक लगाया था। ये मिट्टी, ये पत्थर, ये धरा पूजनीय है। पृथ्वी, माँ गौरी है, माँ दुर्गा है, माँ कल्याणी है। हम नित प्रात: उठकर इसका वंदन करते है। यशोगान व पूजन करते हैं।
या देवी सर्वभुतेषु, शक्ति रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:।

- विनोद नायक
शक्तिमातानगर, नागपुर (महाराष्ट्र)

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