विश्व स्तर पर देवनागरी को वैज्ञानिक लिपि के रूप में मान्यता प्राप्त : डॉ. गंगाधर वानोड़े
नागपुर पुणे। देवनागरी लिपि की मान्यता वैज्ञानिक की लिपि के रूप में पूरे विश्व में है। विदेशी भाषा वैज्ञानिकों ने भी इसे माना है। इस आशय का प्रतिपादन डॉ. गंगाधर वानोड़े , क्षेत्रीय निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान, हैदराबाद, भारत सरकार ने किया। नागरी लिपि परिषद् , नई दिल्ली तथा धर्म मूर्ति राव बहादुर कलवल कण्णन चेट्टी हिंदू महाविद्यालय, हिंदी विभाग, चेन्नै, तमिलनाडु के संयुक्त तत्वावधान में "नागरी लिपि विभिन्न परिप्रेक्ष"विषय पर आयोजित आभासी राष्ट्रीय गोष्ठी में वे अध्यक्षीय उद्बोधन दे रहे थे। डॉ. वानोड़े ने आगे कहा कि आचार्य विनोबा जी ने कहा था कि भारतीय भाषाओं के लिए सह लिपि के रूप में देवनागरी का प्रयोग किया जाए तो भारतीय भाषाएं आत्मसात करने में आसानी होगी। एक दूसरे से संपर्क स्थापित करने में भी सुलभता होगी।
मुख्य अतिथि डॉ. हरिसिंह पाल, महामंत्री, नागरी लिपि परिषद्, नई दिल्ली ने कहा कि देवनागरी की वर्णमाला विश्व की सबसे सरल, संतुलित व वैज्ञानिक है।देवनागरी लिपि की सबसे बड़ी शक्ति है आंतरिक, तार्किक एवं उसकी अपनी सुनिश्चित व्यवस्था है। परिणामत: नागरी लिपि में उपलब्ध ध्वनि चिन्हों की सहायता से किसी भी विदेशी भाषा के शब्दों का उच्चारण करना सुलभ हो गया है।
विशिष्ट अतिथि डॉ.राजलक्ष्मी कृष्णन, राज्य प्रभारी, नागरी लिपि परिषद, ने कहा कि वैश्विक स्तर पर नागरी लिपि का अपना महत्व है। लिपि भाषा को शाश्वत बनाती है। एक भाषा कई लिपियों में और एक लिपि में कई भाषाएं लिखी जाती हैं। राष्ट्रपिता गांधी जी और विनोबा जी ने देवनागरी का समर्थन किया था। सभी भाषाओं को जोड़ने में नागरी लिपि की महनीय भूमिका है। भारत की लगभग दस भाषाओं और अधिकांश बोलियों की लिपि देवनागरी है।
डॉ.वासुदेवन शेष, विवेकानंद कॉलेज चेन्नै ने "विश्व में प्रचलित नागरी लिपि" विषय पर प्रपत्र प्रस्तुत करते हुए कहा कि देवनागरी लिपि वैदिक युग से पूर्व प्रचलित है, क्योंकि वेदों की रचना नागरी लिपि में हुई है। नागरी लिपि लेखन व पठन में ना कुछ जोड़ा जाता है और ना कुछ घटाया जाता है। ध्वनि क्रम की दृष्टि से नागरी सर्वोत्तम है।क्योंकि नागरी की वर्णमाला व्यवस्थित अद्भुत व वैज्ञानिक है।
नागरी लिपि परिषद, नई दिल्ली के कार्याध्यक्ष डॉ. शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे,महाराष्ट्र ने अपने उद्बोधन में कहा कि आचार्य विनोबा भावे जी के स्वप्न को साकार करने के लिए नागरी लिपि परिषद्, नई दिल्ली पिछले पैतालीस वर्षों से नागरी लिपि के प्रचार -प्रसार में कार्यरत है। देवनागरी लिपि हमारी संविधान सम्मत राष्ट्रीय लिपि है। अतः अपनी सरलता, सुगमता, बोधगम्यता, उच्चारण की शुद्धता, वैज्ञानिकता, ध्वनि लिपि की विशेषता आदि के कारण नागरी लिपि सर्वश्रेष्ठता की कसौटी पर खरी उतरती है।
इसके अतिरिक्त उक्त आभासी गोष्ठी में डॉ.ललिता, आर वी एस, कॉलेज, कोयबतूर ने"हिंदी और नागरी लिपि का महत्व" विषय पर, डॉ.भवानी, अमेरिकन कॉलेज मदुरै ने "नागरी लिपि का वैज्ञानिक स्वरूप" विषय पर, के. कविता, शारदा गंगाधरण महाविद्यालय, पांडिचेरी ने "सभी भाषाओं के लिए उपयुक्त नागरी लिपि" पर, डॉ.अनिता पाटील, गुरु नानक महाविद्यालय चेन्नई ने "नागरी लिपि का गौरवपूर्ण इतिहास" पर, डॉ रंजना राय, एम. जी.आर. जानकी महाविद्यालय, चेन्नै ने "नागरी लिपि का वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं उसके गुण और दोष" पर, डॉ.सुनील पाटिल, डी. जी.वैष्णव, महाविद्यालय चेन्नै, ने "तमिलनाडु में हिंदी प्रचार-प्रसार के आयाम" पर तथा डॉ. तसलीम बानो, सी.टी.टी.ई. महाविद्यालय ने "नागरी लिपि: स्वरूप और विशेषताएं" विषय पर अपने शोध पत्रों का वाचन किया।
धर्ममूर्ति राव बहादुर कलवल कण्णन चेट्टी हिंदु महाविद्यालय,चेन्नै के सचिव एम. वेंकटेशपेरूमाल तथा प्राचार्या डॉ. जी. कलवीकरसी की गोष्ठी में सम्माननीय उपस्थिति रही।
गूगल मिट पटल पर आयोजित इस आभासी संगोष्ठी में लगभग सौ प्रतिभागियों ने अपनी सक्रियता दर्शायी। महाविद्यालय की हिंदी विभाग की अध्यक्ष तथा संगोष्ठी संयोजक डॉ.जैनेब बी ने आभासी गोष्ठी का सफल व सुंदर संचालन किया तथा डाॅ.सुनील पाटील ने आभार ज्ञापन किया।