सत्य के पर्याय हैं गांधी : प्रो. मनोज राय
नागपुर। गांधी भारतीय आत्मा के प्रतीक थे, हैं और रहेंगे। उन्होंने अपने कर्म और आचरण से भारतीय मूल्य-चेतना को अभिप्रमाणित किया। गांधी का चिंतन भारतीय दर्शन की उदात्तता का परिचायक है। वे सत्य के पर्याय हैं। यह बात महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के गांधी और शांति अध्ययन विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष डॉ. मनोज राय ने हिन्दी विभाग, राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय द्वारा गांधी जयंती के निमित्त आयोजित विशिष्ट व्याख्यान में कही।
उन्होंने कहा कि गांधी भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के उन असाधारण पुरुषों में थे जिन्होंने अपने आचरण से मानवीय गरिमा को स्थापित किया। अहिंसा के इस पुजारी ने मनसा-वाचा-कर्मणा मनुष्यता को सत्यनिष्ठा का पाठ पढ़ाया।
महात्मा गांधी के सत्य के प्रयोगों का जिक्र करते हुए प्रो. राय ने बताया कि गांधी की प्रासंगिकता यही है कि आज वे केवल करेंसी में हर क्षण हमारे साथ नहीं हैं, वरन् हमारे आचरण के मापदंड हैं। उन्होंने जितना पढ़ा, उस अनुपात में लिखा बहुत कम, लेकिन जितना लिखा उतना पढ़ने और लिखने के लिए, आम आदमी के लिए एक जन्म काफ़ी नहीं है।
तुलसी के बाद भारतीय आत्मा जिस महापुरुष की कथनी और करनी में बसती है, वे हैं केवल और केवल महात्मा गांधी। गांधी व्यवस्था से नहीं, व्यक्ति से परिवर्तन की चाह रखते थे। सत्य के इस आग्रही ने मनुष्यता के सामने जो मिसाल पेश की, उसका कोई दूसरा उदाहरण पूरी दुनिया में कहीं नहीं है। यह इस राष्ट्र की उपलब्धि है।
प्रास्ताविक रखते हुए हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज पाण्डेय ने कहा कि 'सत्यमेव जयते' की भारतीय परिकल्पना के परिचायक हैं गांधी। गांधी कर्मवादी थे, उन्होंने जो कहा उसे पहले अपने पर लागू किया। उनका जीवन स्वयं एक उदाहरण था और है। जब तक मनुष्य को सत्य की अभिलाषा रहेगी,तब तक गांधी हमारे मार्गदर्शक के रूप खड़े नजर आएंगे।
आनलाइन आयोजित इस कार्यक्रम में अनेक समाजसेवी, प्राध्यापक, शोधार्थी, विद्यार्थी जुड़े। मानविकी संकाय के अधिष्ठाता डॉ. दत्तात्रेय वाटमोडे, डॉ शैलेन्द्र शेंडे, डॉ. मनीष पाठक, डॉ. गजानन कदम, डॉ.एकादशी जैतवार, प्रा. जागृति सिंह सहित अनेक गणमान्य लोग मौजूद थे। अतिथि वक्ता का परिचय प्रा.लखेश चंद्रवंशी ने दिया। आभार प्रदर्शन विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. संतोष गिरहे ने तथा संचालन डॉ. सुमित सिंह ने किया।