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लौकिक प्रेम को अलौकिक प्रेम से जोड़कर प्रेम को बना दिया अमर : डाॅ. लता अग्रवाल


नागपुर/पुणे। जहाँ प्रेम होगा, वहाँ ईर्ष्या, द्वेष और अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं होता। अतः प्रेमाख्यान काव्य परंपरा के प्रेममार्गी कवियों ने लौकिक प्रेम को अलौकिक प्रेम सै जोड़कर अमरता प्रदान की। इस आशय का प्रतिपादन शिक्षाविद तथा वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ. लता अग्रवाल, भोपाल ने किया। 

देश की प्रतिष्ठित स्वैच्छिक हिंदी की प्रचार-प्रसार संस्था  विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में 'प्रेमाश्रयी संत काव्य धारा' विषय पर आयोजित राष्ट्रीय आभासी गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में वे उदबोधन दे रही थी। 

विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज, उ. प्र. के अध्यक्ष डाॅ. शहाबुद्दीन नियाज़ मुहम्मद शेख, पुणे, महाराष्ट्र ने गोष्ठी की अध्यक्षता की। डाॅ. लता अग्रवाल ने आगे कहा कि प्रेममार्गी कवियों ने प्रकृति के एक-एक उपादान से हमें जोड़कर प्रकृतिमय होने का संदेश दिया है। इनकी प्रेमिकाएँ नश्वर प्रेम नहीं, आध्यात्मिक प्रेम को पाने के लिए लालायित हैं। इन कवियों के लेखन में स्वाध्याय की अपेक्षा लोककथाओं पर अधिक बल दिया है, वह लोगों के बहुत करीब है। 

प्रेममार्गी कवियों ने संयोग-वियोग दोनों को अपने क्षेत्र में लेते हुए उन्होंने वियोग की मार्मिक व्याख्या की है। क्योंकि दुख व वेदना इंसान को जोड़ती है। सबसे बड़ी बात इसके नायक और नायिका एक-दूसरे को प्रत्यक्ष देखकर प्रभावित नहीं होते, अपितु पशु-पक्षी या किसी दूत के माध्यम से प्रिय के रूप और गुण को सुनकर प्रेमानुभूति जागृत होती है। 

विशेष अतिथि डाॅ. पल्लवी भूदेव पाटील, लातूर, महाराष्ट्र ने कहा कि सूफी कवियों पर हिंदू संस्कृति और रीति-रिवाज़ों का ज़बरदस्त प्रभाव रहा है। जायसी का उद्देश्य सूफी मत का प्रचार-प्रसार करना नहीं था, बल्कि प्रेमतत्व का प्रचार करना था। इनका प्रेम अश्लीलता को छूता नहीं। पद्मावत में भारतीय तीर्थों का वर्णन है। प्रेम प्राप्ति का नाम नहीं, अपितु वह रहस्यवादी व ईश्वरीय है। उसमें प्रेम की पीर विद्यमान है।

श्रीमती मधु शंखधर 'स्वतंत्र', प्रयागराज ने कहा कि सूफी काव्य में उस प्रेमतत्व का वर्णन है, जो ईश्वर से मिलाने वाला है। ओम प्रकाश त्रिपाठी, सोनभद्र, उ.प्र. ने कहा कि सूफी काव्य के रचनाकार कम पढ़े-लिखे किंतु अनुभवी थे। उनकी मान्यता थी कि परमात्मा की प्राप्ति प्रेम से होती है। उषा किरण श्रीवास्तव, मुजफ्फरपुर, बिहार ने कहा कि सूफी कवियों ने सादा जीवन अपनाया था, पर उनके विचारों में उच्चता और व्यवहारों में निश्छलता थी। सांसारिक जीवन से दूर रहकर सूफी काव्य में लोकजीवन का पर्याप्त चित्रण पाया जाता है। डाॅ. पूर्णिमा मालवीय, प्रयागराज ने कहा कि प्रेममार्गी कवियों ने प्रेम को साधन बनाया था। उन्होंने हिंदू संस्कृति को अपनाकर काव्य रचना की।

रश्मि श्रीवास्तव 'रश्मि लहर' ने कहा कि जायसी का हृदय कोमल भावना और पीड़ाओं से भरा हुआ था। सूफी कवियों ने प्रकृति का वर्णन आलंबन और उद्दीपन के रूप में किया है। अतुल शुक्ल ने कहा कि प्रेम की पीर का साधकों से गहरा संबंध है। जायसी ने नायक और नायिका के प्रेम को समान बताया है। सूफी काव्य में रहस्यवाद की भावना परिलक्षित होती है। श्रीमती मधु टाक, इंदौर ने कहा कि  साहित्य का आधार भक्ति है। सूफी साहित्य में धर्म साधना नहीं, भावना है। उसमें हिंदू धर्म की नायिका को अपनी कहानियों का विषय बनाया है।  नारी को परमात्मा का रूप माना है।

विश्व हिंदी सेवा संस्थान, प्रयागराज, उ.प्र. के सचिव डाॅ. गोकुलेश्वर द्विवेदी ने प्रस्तावना में कहा कि प्रेममार्गी कवि सांप्रदायिक सद्भावना के साथ मानव एकता को महत्व देते हैं और उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया है। डाॅ. शहाबुद्दीन नियाज़ मुहम्मद शेख, पुणे, महाराष्ट्र ने कहा कि सूफियों ने प्रेमाख्यानों की रचना की। उन्होंने कथा को आध्यात्मिकता के साथ जोड़ा है। प्रेममार्गी कवि भारतीय संस्कृति से विमुख नहीं थे। उनके काव्य में दर्शन से अधिक संवेदना अधिक पायी जाती है। 

सूफी काव्य में सूफी विचारधारा और भारतीय जीवन दर्शन का अद्भुत समन्वय है। इस अवसर पर डाॅ. मुक्ता कौशिक (रायपुर), डाॅ. भरत शेणकर, प्रा. पोपट आवटे की उपस्थिती रही।
डाॅ. पूर्णिमा मालवीय, प्रयागराज ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। श्रीमती पुष्पा श्रीवास्तव 'शैली रायबरेली ने स्वागत भाषण दिया। गोष्ठी का सफल संचालन डाॅ. रश्मि चौबे, गाज़ियाबाद ने किया तथा नुपुर मालवीय, प्रयागराज ने आभार प्रदर्शित किए।

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