गाँधीजी समय का महत्व सिखाते रहे : डॉ विनोद नायक
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साहित्यिकी में गूँजी गाँधी - शास्त्री की रचनाएँ
नागपुर। गाँधीजी सत्य - अहिंसा के पुजारी तो थे ही वे त्याग, करूणा व उपकार के अनुनायी भी थे। उन्होंने देश को स्वतंत्र कराने में इन हथियारों का कुशलता से प्रयोग किया। सदैव गीता साथ में रख, धर्म पर चलने की सीख दी तो कमर में घड़ी लटकाकर समय का पालन करना सीखाते रहे अौर शास्त्रीजी निष्ठा व कर्मठता के जीते जगाते उदाहरण थे। जिन्होंने जय जवान जय किसान के नारे से चीन-भारत युद्ध अौर हरित क्रांति जैसे महायुद्ध में जीत निश्चित की।
उक्त विचार विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मेलन के उपक्रम साहित्यिकी के अंतर्गत कवि सम्मेलन में संयोजक डॉ विनोद नायक ने व्यक्त किये। कार्यक्रम की अध्यक्षता हाजी जफर राही ने की। सहसंयोजिका हेमलता मिश्र मानवी मंचासीन रहीं।
सर्वप्रथम शादाब अंजुम ने "रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा, जोक बनेंगे बापू पर और नाथू पूजा जाएगा, तस्वीरों की शोभा होंगे बापू के तीनों बंदर, वो बंदर खबरों में होगा जो हुड़दंग मचायेगा।" रचना पढी तो तन्हा नागपुरी ने "मोहब्बत की राहों के घर कम नहीं हैं, कोई ग़म न करना अगर हम नहीं है" रचना प्रस्तुत की। मंजू कारेमोरे ने "सत्य अहिंसा का दिया, जन-जन को संदेश, चलकर उनके मार्ग पर, हुआ स्वतंत्र यह देश" रचना पेश की। हेमलता मिश्र मानवी ने "मनुज कलियुगी सारथी, लोभ मोह रथ थाम, दोहन प्रकृति का करे, बाँधे मन न लगाम" कविता प्रस्तुत की। विवेक असरानी ने "साठ साल की उम्र नहीं सोलह साल की जवानी है, सून मुन्ने की अम्मा, मै राजा तू रानी है" रचना प्रस्तुत की।
मीरा जोगलेकर ने "रास्ते कितने भी साफ हों देखकर चलें, हर तरफ फैला एक मकड़जाल है" रचना पेश की। डॉ विनोद नायक ने "दर्द दूजे का जब अपना बन जाये, तब अहिंसा का मतलब समझ आये" रचना प्रस्तुत की। माधुरी राऊलकर "गुजरते वक्त से सफर मांग लिया, अौर जीने का हुनर मांग लिया" रचना पेश की। साहित्यकार सतीश लाखोटिया, डॉ भोला सरवर, डॉ मधुकरराव लारोकर, सुरेन्द्र हरडे, तन्हा नागपुरी, हाजी जफर राही, रूबीदास, गौरी कनौजे, मनिद्र सरकार मणि, गुलाम मोहम्मद खान आलम व नीलिमा गुप्ता ने अपनी रचनाओं से मनमोह लिया। आभार सहसंयोजक शादाब अंजुम ने माना।