आधुनिकता की दौड़ में जिंदगी बनी तनावग्रस्त
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नागपुर। आधुनिक सुख-सुविधाओं की दौड़ इस कदर बढ़ रही है कि हर इंसान सुख-सुविधाएं जुटाने में सबकुछ भुलाकर व्यस्त हो गया है। इस अंधी दौड़ का दुष्परिणाम यह है कि हमारी आवश्यकताएं तेजी से बढ़ रही है और बढ़ रहे हैं अनाप-शनाप खर्चे, जिनकी पूर्ति कर पाना आसान नहीं है। चूंकि किस्तों में सबकुछ मिल रहा है - मकान, दुकान, गाड़ी यहां तक कि देश-विदेश के टूर्स भी किस्तों में अदायगी के द्वारा उपलब्ध है। जिसे देखो, वही अपने स्टेटस को अनावश्यक महत्व दे रहा है।
यही वजह है कि आय से अधिक खर्च होने लगा है और स्थिति यह देखने में आ रही है कि अधिकतर लोग तमाम कोशिशों के बावजूद भी खर्चों की पूर्ति कर पानें असमर्थ नजर है हम, खर्चीली जिंदगी जीने का आदी बना दिया। बच्चे भी भौतिकवाद में शाही जिंदगी जीने के आदी हुए जा रहे हैं। जैसे-तैसे लोग तमाम सुविधाएं तो जुटा लेते हैं किंतु इस अंधी दौड़ में कर्ज से त्रस्त हो जाते हैं और बढ़ा लेते हैं अनावश्यक तनाव। एक समस्या से इंसान उबरता नहीं, तो दूसरी से जूझने लगता है। आपाधापी की इस जिंदगी में अनियमितताएं बढ़ रही हैं। असंतुलित जिंदगी में खान-पान भी अव्यवस्थित हो गया है। यहीं रोगों को हम आमंत्रण दे देते हैं।
धूम्रपान, शराब फैशन बन गया है। ब्लडप्रेशर, डायबिटीज के रोग बढ़ रहे हैं। ऐसी बीमारियों से हार्ट, लीवर और किडनी अधिक प्रभावित हो रही है। धीरे-धीरे होते हुए शरीर के अन्य अंगों को नुकसान पहुंच रहा है। हमारी सारी कमाई दवाखानों के चक्कर लगाने में खर्च होना शुरू हो जाती है। क्या फायदा ऐसी दौड़ में सम्मिलित होकर जहां सारा परिवार ही तनावग्रस्त जिंदगी जीने को बाध्य हो जाए और फिर समय यह भी आ जाये कि इंसान कुछ भी उपयोग करने लायक न रह पाए।
आज की भागदौड़ की जिंदगी में अनियमितताएं बढ़ रही हैं न ही हम समय से सोते हैं और न ही उठते हैं। खाने-पीने का भी कोई निश्चित समय नहीं होता है। जब समय मिला खा लिया वाला दौर जो है। जिसे देखो उसी के सिर पर भूत सवार है सफलता के शिखर को चूमने का। दुनिया का सबसे बड़ा दौलतमंद इंसान बनने का। इसी उधेड़बुन में हमने अपनी जिंदगी तनावग्रस्त बना डाली। अन्य रोगों के साथ-साथ दिल के रोग भी बड़ी तेजी से बढ़ रहे हैं। व्यक्ति शारीरिक रूप से कमजोर होता चला जा रहा है। हर पल थकान रहती है, आलस्य बना रहता है, दिल धड़कने लगता है। ज्यादा काम करने पर सांस फूलने लगती है। सिर में दर्द होने लगता है। बेचैनी सताने लगती है। भूख भी नहीं लगती। नींद तो गायब हो जाती है। परिणामत: व्यक्ति आयरन डिएफिशिएसी एनीमिया का मरीज बन जाता है।
हृदय रोगियों की जिस तेजी से हमारे देश में संख्या बढ़ रही है,यह सचमुच ही चिंतन का विषय है। वैसे भी मौजूदा आंकड़े खतरे की घंटी बजा चुके हैं। बच्चों में भी हृदय रोग की बढ़ती हुई संभावनाएं बदलती हुई जीवन शैली के दुष्परिणामों को उजागर कर रहा है। प्रतिदिन के निधन समाचारों की ही यदि हम सालाना समीक्षा करें तो यह बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि 30 से 40 वर्ष की उम्र के लोगों की आकस्मिक मौत का एक प्रमुख कारण तनाव और हृदय रोग है।
तनावमुक्त रहने के लिए ध्यान योग, प्राणायाम जरूरी है, जिसके लिए हमारे पास समय नहीं है। यही वजह है कि हमारे लिए समय सिकुड़ता जा रहा है। नियमित समय पर संतुलित आहार लेना तभी संभव होगा, जब हम अपनी अनावश्यक आवश्यकताओं पर काबू पाने हेतु प्रयत्नशील होंगे। इसके साथ-साथ हमें समय-समय पर हेल्थ चेकअप भी कराना होगा तभी रागों से बचाव होगा।
आज जरूरत है डिप्रेशन से बचने की, न कि उसे गले लगाने की। यदि हम संयम एवं धैर्य के साथ धीरे-धीरे अपने जीवन स्तर को सुधारने की आदत डालें और उतनी ही सुख-सुविधाएं जुटाने का प्रयास करें जितनी एक अच्छी जिंदगी के लिए जरूरी है तो हम स्वयं अपने परिवार को अनावश्यक तनावों से दूर रख सकते समझदारी इसी में है कि हम अपनी आवश्यकताओं को मूल्यांकन करें और अनावश्यक जरूरतों को कम करने का प्रयास करें। बुजुर्गों ने ठीक ही कहा है जितनी चादर उतने ही पैर फैलाएं किंतु आज की.इस आधुनिक संस्कृति में हर कोई पैर फैलाते जाता है और उसके बाद चादर लंबी करने की कोशिशों में जुटता है। यहीं हर किसी से चूक होती है और अच्छी खासी जिंदगी तनावग्रस्त हो जाती है। अच्छा होगा यदि हम आत्मिक एवं मानसिक सुख-शांति को महत्व दें, न कि भौतिकवाद को। जरूरी है मानसिक तनाव से स्वयं को मुक्त रखने की।
- डॉ. दीपक लालवानी
नागपुर (महाराष्ट्र)