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या देवी सर्व भूतेषू शक्ति रूपेण संस्थिता

                                       


नवरात्र विशेष लेख

यह संपूर्ण सृष्टि किसी एक सर्वोच्च शक्ति के द्वारा संचालित हो रही है इसे प्रायः सभी स्वीकार करते हैं। इसी शक्ति को भारतेतर राष्ट्र यदि सुप्रीम पावर कहते है, तो भारतीय वेद पुराणों महर्षियों ने इसे आद्य शक्ति कहकर माँ के रुप में इसकी आराधना अर्चना की है। इसे ही बीज स्वरूपिणी भी कहा गया है , कारण एक सूक्ष्म बीज में समाहित  विषाल वृक्ष की तरह ही इस बीज स्वरूपिणी देवी में संपूर्ण सृष्टी समाई है। और यही आद्य शक्ति इस संसार की जन्म दात्री होने के कारण  जगत जननी के रुप में पूज्य है।
             

देवी पुराण के अनुसार सूर्य, चंद्र तारे, शब्द, स्पर्श  आदि किसी भी प्रकार के तेज से रहित जगत में सर्व प्रथम केवल ब्रह्म स्वरूपिणी देवी ही विद्यमान थी ।इस परा शक्ति ने पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि व वायु), पंच तन्मात्रा (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) दस इंद्रियां (पांच ज्ञानेन्द्रिय, पांच कर्मेंन्द्रिय) तथा अंतःकरण चतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त अहंकार) इन चौबीस तत्वों, व एक पच्चीसवां तत्व पुरुष के सहयोग से सृष्टि की रचना की। और स्वयं प्राणिमात्र में प्राणदायिनी शक्ति के रुप में स्थापित हुई। इन भगवती की ईच्छा से ही ब्रह्मा सृष्टि का सृजन, विष्णु पालन व शिव संसहार करते हैं। तात्पर्य यही है कि इस सृष्टि का सृजन, पालन व संहार आदि शक्ति के आदेश से ही होता है। अतः सर्व सामान्य मानव तो क्या, देवता भी इस आद्यशक्ति के चरणैं में शीष झुकाते आए हैं। व उसकी मातृ रूप में वंदना करते आए हैं।
           

इसी मातृ स्वरूपा देवी ने युग युग में विभिन्न रूपों में प्रगट होकर जीव मात्र के कल्याण के कार्य किये हैं। शरणागत वत्सल देवी ने पीढि़तों के रक्षणार्थ जिन नौ रूपों को धारण किया है उन्हें नव दुर्गा कहते हैं। जिनके नाम क्रमश्ः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंधमाता, कात्यायिनी, कालरात्री, महागौरी, तथा नौवा सिद्धीदात्री है।
             

देवी के इन नौ रूपों की आराधना, अर्चना, अश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नौमी तिथि तक अर्थात नौ दिनों तक की जाती है। इसे ही नवरात्र महोत्सव कहा जाता है। भारत के विभिन्न भागों में देवियों को  विभिन्न रूपों में पूजा जाता है। भक्तगण  उनके बुद्धी, निद्रा, क्षुधा ,छाया, शक्ति, क्षांति, जाति, लज्जा, शांति, श्रद्धा, कांति, लक्ष्मी, वृत्ति, स्मृति, दया,तुष्टी, मातृ, भ्रांति आदि विविन्न रूपों को बारंबार नमस्कार करते हैं।
          

इसके अतिरिक्त चामुंडा, वैष्णवी, वाराही, आदि योग संपन्न देवियां हैं जो देश की चारों दिशाओं में कोने कोने में शक्तिपीठों में विराजमान है। इनमें से कई देवियां शस्त्र धारिणी हैं। किसी के हाथ में गदा तो किसी के हाथ में खड्ग, तोमर,  त्रिशूल, शार्गं, धनुष,  आदि हैं, जिनका उद्येश्य दैत्यों का, दुष्टों का नाश कर भक्तों को अभय प्रदान करना है ।
इतना ही नहीं, दुर्गा सप्तशती में तो यहां तक कहा गया है,
“विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः,
स्त्रियाः समस्ता सकला जगत्सु,

त्वयैकया परितंब यैतत्,
का ते स्तुतिः  स्तव्यपरा परोक्ति।

    अर्थात संसार की समस्त स्त्रियां देवी स्वरूप हैं, संपूर्ण सृष्टि में देवी तत्व ही व्याप्त है, इससे बढ़कर स्तुति करने के लिए और रखा ही क्या है ?

यजुर्वेद में तो  स्त्री असीम आदर का पात्र थी, कहा गया है -
“इडे़ रंते, हव्ये काम्ये चंद्रे ज्योsतेदिते, सरस्वति मही, विश्रुति,
ऐता तेsधन्ये नामानि देवेभ्यो मा सुकृतं ब्रूबात।

इसका अर्थ है स्त्री तू स्तुति योग्य, उत्तम वाणी युक्ता, पूजनीया, श्रेष्ठ शील से प्रकाशमान, अज्ञानांधकार को अपने दिव्य गुणों के प्रकाश सेदूर करने वाली दीनता, हीनता के भावों से रहित है। 'हे स्त्री  उत्तम गुणों के लिए तू मुझे उपदेश किया कर'।
        

आद्यशक्ति ,बीज स्वरूपिणी देवी  के विभिन्न नामों रूपों की वंदना, अर्चना  इस देश में जितनी
की गई है ,शायद ही कहींकी गई हो। देश का कोई कोना, कोई भाग  शायद ही छूटा हो जहां देवी की स्थापना ना की गई हो। यहां तक कि प्रत्येक स्त्री को देवी स्वरूपा मानकर, अनेकानेक गणों से संपन्न होने के लिए उसेगुरु रूप में पूज्य भी मान लिया गया है।
        

मन में बार बार अनेक बार प्रश्न उठते हैं कि फिर अब क्या हो गया है इस देश को ? छली तो वह रामायण व महाभारत काल में भी गई। निरपपराध होने पर भी उसने अग्नि परीक्षा दी, निरपराध होने पर भी शिला रूप में श्राप भोगती रही, तो दृष्टिहीन पुरुष का वरण करने के लिए मजबूर की गई, तो कभी वीरों से भरी सभा में, चीर हरण कर लज्जित की गई, और ज्यों ज्यों युग आगे बढ़ता गया स्त्री की स्थिति बद से बदतर ही होती गई ।पर क्यों..? क्यों…? क्यों नवरात्र में एक ओर तो हम कुमारिकाओं को देवी स्वरूपा मानकर उनके चरण धोते हैं, चरणामृतलेकर माथे से लगाते है और दूसरी ओर जन्म लेने से पूर्व ही उसे कोख में ही मसल देते हैं।यह झूठा दिखावा क्यों ? कन्या का चरणामृत लेने से यदि पुण्य मिलता है तो भ्रूण हत्या से पाप नहीं लगेगा?यह कैसी समझ है पाप और पुण्य की ?

जिन कन्याओं को देवी रूप में हम पूजते हैं,बडी़ होने पर पत्नि, माँ, बेटी बहन बनने पर छली जाती है, सताई जाती है, सरे आम अस्मिता लूटी जाती है, अपमानित की जाती है ,आग में होम दी जाती है। क्यों उसे बराबरी का सम्मान घरों में नहीं दिया जाता? सबसे अधिक दुःखद यह है कि आज रिश्तों की पवित्रता भी सवालों के  घेरे में खडी़ है। पुत्री पिता और बहन जब भाई की हवस का शिकार होती है तो मन चीत्कार कर उठता है, आत्मा तड़फ उठती है। प्रश्न पूछती है क्या यह वही देश है जहां स्त्री को आद्य शक्ति के रूप में पूजा जाता था ? सम्मान का दर्जा दिया जाता था,पूजा जाता था
              

तो क्या अपने को परिवार, समाज व राष्ट्र का मुखिया समझने वाला, अपने को शक्ति संपन्न समझने वाला पुरुष शक्ति स्वरूपा के समक्ष अपने को कमजोर पा रहा है ? संभवतः इसीलिए डरा धमकाकर, उसे लज्जित ,अपमानित कर,उसपर अपनी पाशविक शक्ति का प्रदर्शन कर वह उसे नियंत्रित करने का, वश में करने का प्रयत्न कर रहा है। किंतु वह यह नहीं जानता  कि सौम्य ,शक्ति स्वरूपा स्त्री समय आने पर रौद्र रूप भी धारण कर सकती है। हाथ में कमल का फूल धारण करने वाली  त्रिशूल व खड्ग भी धारण कर सकती है। युग युग में उसने आसुरी शक्तियों का विनाश किया है।उचित यही होगा कि उसकी शक्ति को चुनौती ना दी जाय।


- प्रभा मेहता

नागपुर (महाराष्ट्र)
मो. 94230 66820

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