बावरा मन...
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करे तुझसे यूं प्रीत,
पागल चहुंओर फिरे,
झुमे गाए गीत।
तेरी थाली से प्रिये
मिले मुझे दो कौर,
नासमझ इतराता हूं,
दो पल की है ये ठौर।
ना समझे रे मन बावरा,
इतना अहम् है काहे,
बालू जैसे हाथ से
जीवन फिसले जाए।
चार पल की जिंदगानी है ये
दो पल गए हैं बीत,
मन बाकी दो पल धरे रहे,
बावरे दुनिया की रीत।
- डॉ. शिवनारायण आचार्य
नागपुर, महाराष्ट्र