अंधेरे से उजालों की ओर...
पिछले दो वर्षों में कोरोना महामारी ने संपूर्ण मानव जाति पर जो कहर ढाया वह वर्णनातीत है। जन, धन की अपूरणीय क्षति जहां आंखें अश्रु पूरित कर देती हैं, वहीं कई ऐसे कार्यक्रम, उत्सव, पर्व, पारिवारिक आयोजनों के स्थगन ने भी जन मानस की खुशियों पर कुठाराघात किया। कईयों के वर्षों से संजोये मधुर स्वप्न पूरे होते होते रह गए, तो कईयों को अपने हर्ष, उल्लास आमोद प्रमोद के अवसरों से ही वंचित होना पडा़।
सांसें तो हम सब ले रहे थे, इस दृष्टि से जीवित तो थे पर सच पूछा जाय तो क्या हम जीवन जी रहे थे ? घरों के पिंजरों में बंद पंछियों की तरह हम छटपटा रहे थे, आतुर थे खुली हवा में सांसें लेने के लिए, अपनों से मिलने के लिए, उनसे अपने सुख दुःख, अपने विचार, अपने मन की बातें साझा करने के लिए। बचपन से पढ़ते आए थे 'मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है पर वास्तव में कोरोना के चंद कीडो़ं ने हमें समझाया था समाज का महत्व। बताया था कितना कष्टदायक होता है अपनों के बिना जीना, कितना कठिन होता है पशुओं की तरह एक खूंटे से बंधे रहना, समाज के बिना जीना।
यद्यपि ऐसे कठिन काल में हम सबने खूब उपयोग किया मनोरंजन के तंत्रों का , इलेक्ट्रानिक संसाधनों का, और खूब किया प्रयत्न मन बहलाने का। अपनों से, अपने दूर बैठे रिश्तेदारों, दोस्तों से पारिवारिक लोगों से बतियाने ,बोलने का ,अपने सुख दुःख साझा करने का और हालचाल पूछकर कुछ संतुष्ट होने का। सच पूछा जाय तो ये साधन डूबते को तिनके का सहारा ही सिद्ध हुए। सोशल मीडिया का उपयोग केवल बाते करने के लिए ही नहीं, वी. डी. ओ. पर उन्हें देखने, अपने परिवारों के बहुत ही पुराने फोटो, पारिवारिक आयोजनों के उल्लसित क्षणों को भी उनके माध्यम से बांटा।
पुरानी यादें ताजा कर अपने को खुश करने का प्रयत्न किया। साहित्य संगीत प्रेमियों ने पुस्तकों, का संगीत का सहारा लिया, तो कईयों ने वर्षों पुरानी अपनी दबी हाबीज़ को पूरा करने का प्रयत्न किया। किंतु मन बहलाने, खुश होने के ये साधन आधापेट भोजन जैसे ही सिद्ध हुए। जो सुख, खुशी अपनों से मिलकर उनसे प्रत्यक्ष अपने सुख दुःख बांटकर मिलती है वह केवल फोटो देखकर कहां?
किंतु समय सदा एक जैसा नहीं रहता। लंबी प्रतीक्षा के पश्चात ही सही धीरे धीरे कोरोना के काले काले घने बादल छटने लगे। राहत की रोशनी फैलने लगी तो ईधर इतने समय से लंबित अपने अपने सपने संजोने की, समस्त सामाजिक आयोजन आमोद प्रमोद के कार्यक्रमों की मानों धारा बह निकली। युवक युवतियों ने यदि अपना नया घर संसार बसाने, पर्यटन का आनंद लेने घूमने फिरने की योजनाएं बनाई तो वयोवृद्ध भी क्यों पीछे रहते? अपने उत्तरदायित्वों से निवृत्त हो चुके, जीवन के अंतिम प्रहर का आनंद लेने व देने के लिए वे भी पीछे नहीं थे।
जी हां मैं बात कर रही हूँ उनके मनोरंजन के सुंदर साधन बी. सी. की। जिसका आयोजन मास में एक बार होता है। और सब मिलकर आनंद लेते हैं अपने अनुभव, अपने सुख दुःख मिलकर बांटने का मन हल्का करने का अपना पढा., लिखा साझा करने का। आज के बदलते समाज, से लेकर राजनीति पर चर्चा करने का अथवा कुछ मनोरंजक कार्यक्रमों का। सौभाग्य से मुझे यह सुखद अवसर मिला जिसकी बडे़ लंबे समय से प्रतीक्षा थी। प्रतीक्षा सबकी अपने घर आने की, प्रतीक्षा सबसे मिलकर खूब खूब बातें करने की अपने मन खाली करने की, एक दूसरे से प्रत्यक्ष मिलने की।
आखिर वह पल भी आया। कैसे, किन शब्दों में बखान करूं, उस समय सबके चेहरों पर छायी खुशी का? सबके चेहरों पर छायी मुस्कान का, हंसी का? घर का एक एक कोना गूंज रहा था, हंसी के फुहारों से बातों से। सब बोल रही थीं, बतिया रही थी, हंस रही थी। पर सच पूछा जाय तो किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कौन किस विषय पर किससे क्या बोल रहा है। यह आनंद वर्णनातीत है।कैसे किन शब्दों में वर्णन करूं? पर दो ढाई घंटे कब कैसे बीत गए समझा ही नहीं।
इस पर मेरी एक परिचिता ने सहज ही पूछ लिया था 'कितने की है आप लोगों की बी .सी .?' और जब मैंने कहा केवल दो सौ रुपिया माह, तो आश्चर्य से मुझे वे देख रही थीं। कुछ व्यंग भी था। पर उनकी छुपी मुस्कुराहट पर मेरी हंसी, खुशी भारी थी। मैंने कहा, हमारा उद्देश्य धन नहीं मन है ।वित्त नहीं चित्त है। आनंद मन का, चित्त का ।अपने को खाली कर, भरने का। जिसके समक्ष पैसे कोई मायने नहीं रखता।
काश वे महिला आकर देख पाती उस दिन हमारी बी .सी. पार्टी ! देख पाती सबके चेहरों की हंसी, उल्लास के पल। खुशी के इन पलों में सबको परोसे गये व्यंजनों का स्वाद भी कहीं खो गया था। डूब गया था शब्दों की चासनी में, सच पूछा जाय तो इस ढलती उम्र में हम वयोवृद्धों के लिए यह एक टानिक का कार्य ही करती है जो अगले माह आने वाली बी. सी. तक उर्जा, उत्साह बनाए रखती है।
सच लगभग दो ढाई घंटों की इस रसभरी मीटिंग के पश्चात जब सबने धीरे धीरे विदा ली, तो जो कमरा अबतक हंसी खुशी, ठहाकों से गूंज रहा था वहां एकदम सन्नाटा छा गया। लगा रोशनी से भरे कमरे की अचानक बत्ती बुझा दी गई हो। पर अंततः अंधेरा ही तो है जो प्रकाश का महत्व समझाता है। कोरोना का काला काल हमें उजालों का महत्व समझा गया था । वह उजाला, वह खुशी जो हमें अपनों के बीच रहकर, उनसे अपने सुख दुःख बांटकर मिलती है।
- प्रभा मेहता
नागपुर, महाराष्ट्र
मों . 94230 66820