विश्व की किसी भी भाषा को सीखने में देवनागरी लिपि सक्षम : डाॅ.अनिल शर्मा 'जोशी'
नागपुर/पुणे। राष्ट्र लिपि देवनागरी भारत की सभी भाषाओं सहित विश्व की किसी भी भाषा को सीखने में नि:संदेह सक्षम है। यह कथन केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, आगरा के उपाध्यक्ष डाॅ. अनिल शर्मा 'जोशी' ने व्यक्त किया।
आचार्य विनोबा भावे जी की सत् प्रेरणा से स्थापित नागरी लिपि परिषद्, नई दिल्ली के पांडिचेरी विश्वविद्यालय, पुदुच्चेरी में आयोजित 44 वें अखिल भारतीय नागरी लिपि सम्मेलन के समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में वे अपना उद्बोधन दे रहे थे।
नागरी लिपि परिषद, नई दिल्ली के अध्यक्ष पूर्व कुलपति डाॅ. प्रेमचंद पतंजलि ने सत्र की अध्यक्षता की। डाॅ. शर्मा ने आगे कहा कि विश्व की अन्य लिपियों की तुलना में नागरी एक वैज्ञानिक लिपि है। वर्तमान में विश्व लिपि के रूप में नागरी का कोई विकल्प नहीं है। नागरी लिपि परिषद, नई दिल्ली के महामंत्री डाॅ. हरिसिंह पाल ने नागरी लिपि परिषद के उद्देश्यों, कार्यों व गतिविधियों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
नागरी लिपि परिषद, नई दिल्ली के कार्याध्यक्ष डाॅ. शहाबुद्दीन नियाज मुहम्मद शेख, पुणे, महाराष्ट्र ने कहा कि अपनी सहजता, सरलता, सुगमता, पर्याप्त वर्ण संख्या, वर्णों की क्रमबद्धता, भ्रमहीनता, निश्चितता, स्पष्टता, संदेह रहितता तथा विविध गुणों के कारण देवनागरी लिपि किसी भी भाषा व बोलियों के लिए सहलिपि, संपर्क लिपि तथा जोडलिपि के रूप में महनीय भूमिका निभा सकती है।
इस सत्र में डाॅ. निशा मुरलीधरन, चेन्नई द्वारा' देवनागरी और तमिल लिपि का तुलनात्मक अध्ययन', डाॅ. के. कविता, पांडिचेरी द्वारा,' राष्ट्रीय एकता में नागरी लिपि की भूमिका' डाॅ. नागनाथ शंकरराव भेंडे, कलबुर्गी, कर्नाटक द्वारा, 'देवनागरी लिपि एक वैज्ञानिक लिपि' तथा श्री अक्षत गोयल, दिल्ली द्वारा नागरी लिपि विषय अपने प्रपत्र प्रस्तुत किये गये। डाॅ. नागनाथ भेंडे, कलबुर्गी, कर्नाटक द्वारा लिखित ग्रंथों का लोकार्पण भी इस अवसर पर किया गया।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए नागरी लिपि परिषद, नई दिल्ली के अध्यक्ष पूर्व कुलपति डाॅ. प्रेमचंद पतंजलि ने कहा कि, नागरी लिपि परिषद नागरी लिपि के माध्यम से सभी भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना चाहती है। नागरी लिपि की भूमिका सदैव समन्वयात्मक रही है, जो सभी भारतीय भाषाओं में निकटता स्थापित करना चाहती है। परिषद के इस अभियान में देश के युवा वर्ग की भी सहभागिता आवश्यक है।
पांडिचेरी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की डाॅ. एस. पदम प्रिया तथा डाॅ. जयशंकर बाबू की सत्र में सक्रिय भागिदारी रही।
समापन सत्र में डाॅ. वीरेंद्र सिंह यादव, पटना, डाॅ. गंगाधर वानोडे, हैदराबाद, कर्मवीर सिंह, हापुड, डाॅ. विनोद बब्बर, उमाकांत खुबालकर, गाजियाबाद, डाॅ. पुष्पा पाल, दिल्ली, श्रीमती सरोज शर्मा दिल्ली, श्रीमती अंशुमाला यादव, पटना, आचार्य ओम प्रकाश, दिल्ली, श्रीमती किसलय शर्मा, दिल्ली, डाॅ. बाबा कानपुरी, दिल्ली, प्रो. कार्तिकेय शर्मा, गुरूग्राम, मोहन द्विवेदी, गाजियाबाद, डाॅ. गोपाल, विशाखापट्टनम आदि महानुभावों की उपस्थिति रही।