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सांस


जद्दोज़िहाद क्यों ना करें,
सांस अभी बाकी है,
अभी ना गुजरा वक्त
कुछ सांस अब भी बाकी है।

गुलशन से उजड़े गुलाब,
कुछ कांटे अब भी बाकी है,
रे माली,
ना हो निराश,
कुछ फुल अब भी बाकी हैं ।

लूट रहा है  यह चमन
अपने ही किरदारों से,
पर इस बेबस चेहरे पे
मुस्कान अब भी बाकी है ।

हाथ ना छुड़ाओ साथी
कुछ नब्ज़ अब भी बाकी है ,
कुछ तो मशक्कत कर लो साथी
के सांस अब भी बाकी है ।

- डॉ. शिवनारायण आचार्य
नागपुर (महाराष्ट्र)

काव्य 2279985515546173285
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