जीवन गीता
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गीता जयंती पर विशेष
बचपन में जब जब
नानी के घर जाती, वे
भगवत् गीता पढ़कर,
सुनाने का आग्रह करतीं।
मैं साक्षर थी,
भगवत् गीता से अक्षर पढ़कर
सुना दिया करती, पर
अर्थ नहीं समझती।
वे निरक्षर थीं, पर गीता के
अक्षरों का अर्थ खूब समझती थीं
अर्थ को आचरण बनाती थीं,
निष्काम भाव से कर्म करती थीं,
सुख दुःख, रागद्वेष, निंदा स्तुति
से उपर उठ चुकीं थीं,
ईश्वर को पूर्ण समर्पित थीं,
इसी का तेज, शांति चेहरे पर
पूर्ण झलकती थीं।
साक्षर होना ही जीवन की
सार्थकता नहीं,
अक्षरों के अर्थों को जीना,
भगवतगीता जी कर,
निरक्षर नानी,जाते जाते
सिखा गई थीं।
नागपुर, महाराष्ट्र