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रचना में ट्रीटमेंट ऐसा होना चाहिए कि लंबे समय तक याद रखा जाए' : अनुज खरे



नागपुर। व्यंग्यधारा द्वारा आयोजित 83 वी ऑनलाइन वीडियो गोष्ठी के अंतर्गत 'इस माह के व्यंग्य' कार्यक्रम में अतिथि वक्ता व्यंग्यकार-संपादक पत्रकार नोएडा से अनुज खरे ने अपने उद्बोधन में कहा| अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए अनुज खरे ने कहा कि रचना में शुरुआत की चार-पांच लाइन महत्वपूर्ण होती हैं जो पाठक को बांधकर आगे पढ़ने को मजबूर करती हैं। 

‘गमले में इतिहास' लेखक शशिकांत सिंह शशि की रचना पर उन्होंने कहा कि यह रचना अपने समय के साथ सार्थक संवाद करती और उसे अभिव्यक्त भी करती है| अब रचनाओं में इस तरह की बात होना चाहिए| रचना सटीकता, रोचकता और मारकता के साथ अपने उद्देश्य को लेकर सामने आई है| आत्माराम भाटी जी की रचना 'मुलाकात मच्छरों के प्रधान से' एक औसत रचना है। 

हास्य भी पैदा नहीं कर पाए और ना ही व्यंग्य| अब हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि व्यंग्य का मुकाबला स्टैंडिंग कॉमेडियन से है जो कुछ शब्दों में अपना प्रभाव पाठक पर छोड़ जाता है| जिसे आज का व्यंग्य तीन सौ शब्दों में भी नहीं कर पाता है| विषय भले पुराना हो, पर ट्रीटमेंट ऐसा होना चाहिए कि लंबे समय तक याद रखा जाए| 

गोष्ठी की शुरुआत करते हुए रायपुर से डॉक्टर किशोर अग्रवाल ने जवाहर चौधरी की रचना 'हो गए गंजे देश की चिंता में' पर कहा कि व्यंग्य छोटा है पर जिम्मेदारी से अपनी बात कहता है| व्यंग्य का सौन्दर्य यही है कि किसी का नाम लिए बगैर अपनी बात कह देता है| प्रभाशंकर उपाध्याय की रचना, 'पुरस्कार की आकांक्षा:दो कहानियां' नए कवियों के लिए अलार्म का काम करती है जो पुरस्कार की स्थापना से लेकर पाने तक के गोरखधंधे को उजागर करती है| अपने कहन में यह रचना सफल है|

इंदौर से श्रीमती चेतना भाटी ने व्यंग्य के विविध रूप पर कहा कि व्यंग्य मानव जीवन की आलोचना होता है| इन्होने कैलाश मण्डलेकर की रचना 'श्मशान घोटाले पर सरपंच का इकबालिया बयान' पर कहा कि रचना अच्छी, रोचक पठनीय है| यह उम्दा रचना है| रचना का पूरा दृश्य चल चित्र की भाँति उभरने लगता है| ये अखबार वाले बोम मार रहे हैं| यहां 'बोम' शब्द जबरन ठूँसा लगता है| भाषा पात्र के अनुरूप होना चाहिए। 

विरोधाभास व विसंगतियां व्यंग्य लिखने को प्रेरित करते हैं| लक्षणा, व्यंजना उलटबांसियों के प्रयोग से यह एक अच्छा व्यंग्य है...| मुकेश राठौर की  'आदमी का दिन' उम्दा रचना है जो शुरू से अंत बाँधे रखती है| भोपाल से व्यंग्यकार मलय जैन ने अपने उदबोधन में कहा कि भाषा विचार सरोकार व्यंग्य की आत्मा होती है| इसी पैमाने पर सूर्य कुमार पाण्डेय की रचना 'विवादित बयानों से बाज न आने वाले वीर' पर अपनी राय रखते हुए कहा कि व्यंग्य अच्छा है किंतु इसका शीर्षक लम्बा है| शीर्षक व्यंजनात्मक ढंग से होना चाहिये| रचना में विचार शुरू से आखिर तक बना रहा है। 

भाषा के संबंध में वे कहते हैं कि बकौल डा. रमेश तिवारी "व्यंग्य की भाषा का टेढ़ा होना ही उसकी खूबसूरती है व्यंग्य में बांकपन अनिवार्य है|” भाषा की दृष्टि से यह व्यंग्य समृद्ध है| दूसरे व्यंग्य ‘मौका सिंह का पर्यटन मिशन' पर अपनी बात रखते हुए मलय जैन ने कहा कि मौकापरस्त नेताओं के अनेक हस्तक्षेप हमारे सामने हैं| वहां फटों की प्रतीक्षा की जाती है| इधर फटा उधर टांग डाल दी| रचना में मिशन मोड को पर्यटन माना है| विचार में सफल रचना है| कहीं भटकाव नहीं है| भाषा में बाँकपन नहीं है| सीधा सपाटपन है। भाषा विषय के साथ चलती है, पर खलती नहीं है। भाषा दृश्यात्मक है|

जबलपुर के वरिष्ठ व्यंग्यकार रमेश सैनी ने व्यंग्यधारा के इस आयोजन का संचालन करते हुए आरंभ में विमर्श का प्रारूप, संरचना और अतिथि वक्ताओं का विस्तार से परिचय दिया| विमर्श में दिल्ली से डाँ. रमेश तिवारी जी ने कहा कि आज व्यंग्य पर गंभीर सार्थक बातचीत हुई| कविता को तो हम सरसरी निगाह से पढ़ लेते हैं पर व्यंग्य को सरसरी निगाह से नहीं पढ़ सकते हैं| व्यंग्य का हर विमर्श हमें सीखने-सिखाने का काम करता है| ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है| 

व्यंग्यधारा में ईमानदार लोगों को हम सुनना चाहते हैं| यही व्यंग्यधारा का उद्देश्य है| लखनऊ से राजेंद्र वर्मा जी ने कहा कि अच्छाई के लिए दुनिया है| रचना की कमियों पर चर्चा हो| रचना चार-पांच लाइन पढ़ने पर पढ़ा सके. व्यंग्य के मामले में शीर्षक की बात भी बहुत महत्वपूर्ण है| बीकानेर से मधु आचार्य ‘आशावादी’ जी ने कहा कि अब व्यंग्य के विषय धीरे-धीरे अच्छे लगने लगे हैं| रचनाओं पर विश्लेषण तार्किक ढंग से होना शुरू हुआ है| इसमें व्यंग्यधारा की महत्त्वपूर्ण भूमिका है| सच्ची सही आलोचना की धारा को पुख्ता करना जरूरी है| हम व्यंग्यकारों को आलोचना के क्षेत्र में उतर कर पुख्ता करना है। लखनऊ से परवेश जैन ने कहा, 

व्यंग्यकार को कमजोर के साथ होना चाहिए| सतना के वरिष्ठ व्यंग्यकार संतोष खरे जी ने कहा कि व्यंग्य के लिए महत्वपूर्ण बातें सुनने को मिली| व्यंग्य में समीक्षा की कमी है| व्यंग्यधारा में समीक्षा होती है वह सुनने वाली होती है| मयंक पांडे ने कहा कि यहाँ समीक्षा प्रारूप अनूठा है जिसमें बिना राग द्वेष के रचना पर समालोचना होती है|

संयोजन  प्रखर व्यंग्य आलोचक डाँ.रमेश तिवारी (दिल्ली) ने बखूबी निभाई। आभार प्रदर्शन टीकाराम साहू 'आजाद' ने किया। व्यंग्य रचना विमर्श गोष्ठी में श्रीमती वीना सिंह (लखनऊ), श्रीमती रेणु देवपुरा (उदयपुर), प्रभाशंकर उपाध्याय (सवाई माधोपुर), प्रभात गोस्वामी (जयपुर), जय प्रकाश पाण्डेय (जबलपुर), डाँ. महेन्द्र सिंह ठाकुर (रायपुर), कुमार सुरेश (भोपाल), अल्का अग्रवाल सिगतिया (मुम्बई), तीरथसिंह खरबंदा (इंदौर),राकेश सोहम(जबलपुर), पिलकेन्द्र अरोरा (उज्जैन) सौरभ तिवारी, आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।
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