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परम्पराओं की पुरानी लिथड़ती चादर !!!


आधुनिक शादियों परम्पराओं की सिकुड़ती चादर !

अब लगता है कि किसी का भी लाज-लिहाज न करना (या लोक-लाज की मान्यता का न होना) ही आधुनिकता और प्रगतिशील होने का पर्याय हो गया है। खासतौर पर आधुनिक शादियों में दूल्हा-दुल्हन का जिस तरह का नाच-गानपूर्ण खुला व्यवहार होता है, उसको देखते हुये पारम्परिक दूल्हा-दुल्हन जैसे शब्दों को दूसरे आधुनिक प्रगतिशील शब्दों से बदला जाना चाहिये। 

दूल्हा-दुल्हन के शब्दयुग्म से सामाजिक लिहाज की परिभाषा प्रतिध्वनित होती है, जो कि व्यवहार में कहीं दृश्यमान नहीं होती। अगर इतना ही आधुनिक और प्रगतिशील लिहाजहीन व्यवहार करना है, तो परम्परा की पुरानी चादर ओढ़कर क्यों करें? इस पुरानी चादर की जगह कुछ नया और स्वकेंद्रित आभरण व आचरण का आविष्कार किया जाना चाहिये, ताकि पुराने ख़यालात के दर्शकगण भी इस लोक-लिहाज की प्राचीन परम्परा से खुद को मुक्त कर सकें। आयोजनों में पूर्ण उच्छृंखलता का नियम हो और जो लोक-लिहाज करे उसे आयोजन से बाहर करने की व्यवस्था हो। 

क्योंकि लोक-लिहाज को मान्यता देने वाले पिछड़ी मानसिकता के ऐसे लोग इन प्रगतिशील आधुनिक आयोजनों की सबसे बड़ी बाधा हैं। आज जब उच्छृंखलता ही स्वतंत्रता है, तो परम्परा की ऊपरी और दिखावटी बेड़ियां भी क्यों धारण की जायं? 'खूबसूरत' फिल्म में रेखा की हुंकार को आज आजादी का नारा बनाया जाना चाहिये कि 'सारे बंधन तोड़ दो, नियम पे चलना छोड़ दो'! हालांकि रेखा की वह हुंकार भी पारम्परिक मूल्यों को नहीं छोड़ पाई थी, पर अब वह गलती नहीं होनी चाहिये।

- प्रभाकर सिंह
प्रयागराज (उ. प्र.)

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